Monday, 3 July 2017

Krishna Kathayein - Tales of Shri Krishna Part-3

नित्य नई-नई लीलाएं करके को आनंदित करना था पूर्व जन्म में नंदबाबा और यशोदा मैया ने जान की उपासना करके भगवान से पुत्र रूप में वात्सल्य सुख की ही तो प्रार्थना की थी भगवान उस इच्छा को अधूरी कैसे रहने देते इसलिए वह नृत्य नवीन पांडे लीला से मां को रिझाने का प्रयास करते थे कान्हा नंद के चरणो मे आंगन में घुटनों के बल कि अधिकारी मारते हुए खेल रहे थे अचानक उनकी दृष्टि अपनी परछाई पर पड़ी तो उन्हीं का अनुकरण कर रही थी क्या जब भी हंसते तो परछाई हंसती थी जब चलते तो परछाई चलती थी कन्हैया बहुत खुश हुए सोचा चलो एक नया साथी मिल गया घर में अकेले खेलते खेलते मेरा मन खुश हो जाता है अब यह रोज मेरा मन बहलाया करेगा कन्हैया अपनी परछाई से बोले भैया तुम कहां रहते हो चलो हम दोनों मित्र बन जाएं कहां हो जब मैं माखन खाऊंगा तो तुम्हें भी खिलाऊंगा जब दूध पियूंगा तो तुम्हें भी पिलाऊंगा चलाओ भैया मुझसे बड़े हैं इसलिए वह मुझसे लड़ जाते हैं तुम मुझसे लड़ना नहीं हम लोग खूब प्रेम से रहे हो देखो ना यहां किसी भी चीज की कोई कमी नहीं है तुम्हें गाना माखन मिश्री चाहिए मैं तुम्हें मैया से कहकर दिला दूंगा आओ हम दोनों आपस में गले मिल ले ताकि आज से मित्रता अच्छा हो जाए इस प्रकार कहते हुए कन्हैया बार-बार अपनी छत जीने का प्रयास करने लगे बार-बार आगे पीछे इधर-उधर घूमते किंतु परछाई किसी की पकड़ में आई है क्या कि कन्हैया की पकड़ में आ जाती जब थक कर हार गए किसी प्रकार भी ना पकड़ सके तो दुखी हो गया यार श्याम के दुखी हो परछाई भी दुखी दिखाई देने लगी अपने लाल का मुखड़ा गाना देखकर यशोदा मैया नजदीक गई ध्यान से उन्होंने कन्हैया की तरफ देखा कन्हैया की आंखें डबडबा आई उन में आंसू भर गए हैं उनका आंचल पकड़कर सुबक सुबक कर रोने लगे मां ने पूछा कन्हैया तुम्हे क्या हो गया तुम क्यों रो रहे हो क्या है श्रीकृष्ण ने माता को अपना प्रतिबिंब दिखाकर बात बदल दी जय श्री कृष्ण बोले मैया मैया यह कौन है क्या वह लोग वह तुम्हारा माखन चुराने के लिए घर में घुस आया है मैं बार-बार मना कर मानता ही नहीं मैं क्रोध करता हूं तो यह भी क्रोध करता हूं मैया आओ ना हम दोनों मिलकर इसे बाहर कर दें नहीं तो यह तुम्हारा सब माखन खा जाएगा मैया कन्हैया के इस भोलेपन पर मुक्त हो गई क्या और कंहैया के आंसू पोंछ कर उन्हें गोद में ले लिया एक दिन माता यशोदा दही मत कर माखन निकाल रही थी अचानक मां को आनंद देने के लिए बल राम और श्याम उनके निकट पहुंच गए कन्हैया ने मटकी फोड़ी पकड़ ली और बलराम ने मोतियों की माला दोनों मां को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करने लगे बलराम कहते थे मां पहले तुम मेरी सुनो और कंहैया कहते थे नहीं मां पहले तुम मेरी सुन मैया मुझे बड़ी जोरों की भूख लगी है भूख से हारा बुरा हाल है चलो ना जल्दी से मुझे माखन रोटी दे दो देखो ना आए हैं खेलते खेलते बिल्कुल ही थक गया हूं मैं माखन रोटी खाकर जल्दी से सो जाना चाहता हूं यशोदा जी ने कहा बेटा दूध पी लो या घर में नाना प्रकार के पकवान बने हैं जो तुम्हारी इच्छा हो खा लो कन्हैया ने कहा नहीं मैं तो केवल माखन खाऊंगा मेवा पकवान तो मुझे बिल्कुल अच्छे नहीं लगते जब तक तुम मुझे माफ कर नहीं दे दोगी तब तक मैं तुम्हारी छोटी खींचता ही रहूंगा मां ने कहा


कन्हैया अगर तू माखन खाएगा तो तेरी यहां आओ छोटी रह जाएगी कभी नहीं बढ़ेगी कन्हैया ने कहा मां तू दाऊद आपको तो कभी मना नहीं करती मैं तो जब भी मांगते हैं तब उन्हें माखन नहीं होने देती हो मुझे क्यों नहीं दे रही हो मैंने कहा कान्हा देखो पहले मैं दाऊ को भी माखनलाल नहीं देती थी वह भी मेवा पकवान खाता था और दूध पीता था तभी तो उसकी छोटी लंबी हड्डी है यदि तुम भी दूध पियोगे तो तुम्हारी भी छोटी लंबी हो जाएगी जाओ मेरे लाल अच्छे बच्चे जिद नहीं करते जाकर पद्मगंधा गाय का दूध रखा है पी लो मैंने कहा मां बोलती है कितने साल तो मुझे दूध पीते होंगे मेरी छोटी बिल्कुल नहीं बढ़ी आज तुम्हारा बहाना नहीं चल सकता Tumhe मुझे माखन रोटी देनी ही पड़ेगी मैया ने कहा गाना डाउ अब बड़ा हो गया है इसमें कौन से अधिक दिनों तक दूध पिया है इसीलिए दाव की चोटी बढ़ गई जब तुम भी उतने ही दिनों तक दूध पी लोगे तब तुम्हारी भी छोटी उतनी ही बढ़ जाएगी कन्हैया ने कहा मैया हम यह सब मैं नहीं सुनूंगा तुम साफ-साफ बताओ रोटी देती हो कि नहीं यदि तुम माखन रोटी नहीं दोगी तो आज से मैं तुमसे नहीं बोलूंगा ना तुम्हारी गोद में ही आऊंगा अब दाऊजी तुम्हारे पुत्र हैं मैं भला तुम्हारा क्या लगता हूं क्या माता यशोदा ने कहा कान्हा तू मेरा प्राण है हृदय है तेरे बिना भला हम कैसे रह सकती हूं मेरे नन्हे लाल मैं तेरी बलिया लेती हूं कृपया तुम्हें अधिक भूख लगी है ना मुझे मक्खन निकाल लेने दो फिर तुझे जितना माखन चाहिए ले लेना अब तो खुश हो जाओ सरकार मां यशोदा मानो कंठक वात्सल्य समय में डूब गई उनकी आंखों से प्रेमाश्रु पड़े यशोदा मैया धन्य है त्रिभुवन का भरण पोषण करने वाले प्रभु उनके आगे माखन के लिए बार-बार हमें इज्जत करते हैं यशोदा मैया से बड़ा सौभाग्य भला किसका होगा एक बार भगवान श्यामसुंदर ग्रुप कुमारों के साथ खेल रहे थे श्रीदामा बलराम तथा मनचला हाथी उनके साथ है 10 मई क्रीडा का आनंद ले रहे थे इस खेल में एक बालक दूसरे के हाथ में चोट ताली मार कर भागता और दूसरा उसे पकड़ने का प्रयास करता था बलराम ने कहा मोहन तुम मत भागो तुम अभी छोटे हो तुम्हारे पैरों में चोट लग जाएगी मोहन ने कहा दाऊ भला ऐसे कैसे हो सकता है कि मैं अपने साथियों के साथ खेल में हिस्सा ना लूं मैं दौड़ना जानता हूं मेरे शरीर में बहुत बल है मेरी जोड़ी श्रीदामा है क्या मेरे हाथ में ताली मारकर भागेगा और मैं उसे पकड़ लूंगा श्रीदामा ने कहा नहीं तुम मेरे हाथ में ताली मार कर भागो मैं तुम्हें पकड़ता हूं जिस प्रकार भगवान श्यामसुंदर सुदामा के हाथ में ताली मार कर भागी और सुदामा उन्हें पकड़ने के लिए उनके पीछे पीछे दौड़ा दूर जाकर ही उसने श्याम सुंदर हो कर लिया श्याम सुंदर ने कहा मैं तो जानबूझकर खड़ा हो गया हूं तुम मुझे क्यों रोते हो ऐसा कहकर श्याम श्रीदामा से झगड़ने लगे सुदामा ने कहा पहले तो तुम जोश में आकर दौड़ने खड़े हो गए और जब हार गए तो झगड़ा करने लगे बलरामजी बीच में बोल पड़े इसके तो नाम आता है ना पिता ही नंदबाबा और यशोदा मैया ने इसे कहीं से बोल लिया है यह हार जीत का लिंग भी नहीं समझता स्वयं हारकर सखाओं से झगड़ पड़ता है ऐसा कह कर उन्होंने कन्हैया को डांटकर घर भेज दिया कि हम रोते हुए घर पहुंचे यशोदा मैया रोने का कारण पूछने लगी मोहन ने रोते मे कहा मैया दाऊ दादा ने आज मुझे


बहुत ही चढ़ाया वह कहते हैं कि तू मोह लिया हुआ है यशोदा मैया ने भला तुझे जन्म कब दिया मैया मैं क्या करूं इसी क्रोध के मारे खेलने नहीं जाता दो ने मुझसे कहा कि बता तेरी मां का कौन है कर्ता कौन है नंदबाबा को गोरे हैं और यशोदा मैया भी गोरी है फिर तू सावला कैसे हो गया ग्वाल बाल भी निरहू की लेते हैं और मुस्कुराते हैं तुमने भी केवल मुझे ही मरना सीखा है जान दादा को तो कभी डांटती भी नहीं मैया कन्हैया के आंसू पोंछते हुए बोली मेरे प्यारे मोहन बलराम तो चुगल खोर है वह जन्म से ही धूर्त है तू तो मेरा हमारा लाल है काला कह कर दो तुम्हें चढ़ाता है तुम्हारा शरीर तो इंद्रनील मणि से बाहर है भला तो तुम्हारी बराबरी क्या करेगा श्यामसुंदर मैं गायों की शपथ लेकर कहती हूं कि मैं तुम्हारी माता हूं और तुम ही मेरे पुत्र हो जय हो गोपाल का गायों से प्रेम तो निराला ही था गायों का गोकुल में जन्म भी उनके अनेक जन्मों का पुंय का परिणाम था वह कितनी भाग्यशाली नहीं थी जय श्री कृष्ण का कुछ कार भरा नहीं मिलता था गोपाल बार-बार अपने पिक गायों के शरीर की धूल साफ करते तथा उन्हें अपने कोमल हाथों से कहलाते थे गायों को भी श्रीकृष्ण को देखे बिना चेन नहीं मिलता था वह बार-बार श्री कृष्ण किशन की लालसा से नंद भवन के मुख्य दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देख सकती ताकि जैसे ही श्रीकृष्ण निकले वह अपनी आंखों को उनके दर्शन से तृप्त कर सकें जब भी मोहन बाहर निकलते गाय उनके शरीर को अपनी जीभ से चाट चाट कर अपना पूर्ण वात्सल्य उनके ऊपर उड़ती रहती थी गाय भी यशोदा मैया से कम भाग्यशालिनी नहीं थी क्योंकि उन्हें कन्हैया को अपना दूध पिलाने का अवसर प्राप्त हो रहा था और बदले में कन्हैया का प्रेम मिल रहा था गोकुल या ब्रिज में रज करो जी बन जाना बहुत बड़े सौभाग्य की बात है रसखान उनसे याचना करते हुए कहा है जो पशु हो तो कहा बसु मेरो करो नित्य नंद की धेनु मजारे वाहन हो तो वही गिरी को जो तेरे होकर शंकर पुरंदर धारण कन्हैया गायों को मां की तरह ही प्यार करते थे इसी से मौका मिलते ही उनके पास चले जाते थे एक दिन कन्हैया सुबह-सुबह नंद भवन से गौशाला में पहुंच गए वहां पर एक गाय उन्हें अपना दूध पिलाने के लिए उनकी प्रतीक्षा कर रही थी वह वात्सल्य स्नेह से उस गाय का दूध अपने आप हो रहा था गाय की दृष्टि एकटक नंद दरवाजे पर लगी थी ताकि श्री कृष्ण बाहर निकले और वह उन्हें अपना दूध पिला कर अपना जीवन सार्थक कर सके कन्हैया उसके परिणाम प्रेम की उपेक्षा भला कैसे करते आनंद भवन से निकलकर गौशाला में सीधे उस गाय के पास पहुंचे और उसके थन में जाम लगाकर उसका दूध पीने लगे इधर यशोदा जी कन्हैया को चारो तरफ अभी बार-बार भोपाल को कान्हा ओ कान्हा तू कहां गया अरे जल्दी से आ भी जा रहा हूं मैं कब से तेरी प्रतीक्षा कर रही हूं लेकिन कन्हैया होता तब ना सुनता वह तो अपनी गैया मां का दूध पी रहा था यशोदा उसे पुकारती हुई सोच रही थी पता नहीं लाला कहां चला गया उसने अभी तक कलेवा भी नहीं किया है खिड़की से बाहर झांक कर उन्होंने देखा कि ताना दिया माता के थन में मुंह लगाकर दूध पी रहा है गाय कन्हैया का शेर नहीं है यशोदा मैया ने कहा कि गैया मां तू धन्य है वह तो अभी कन्हैया के कलेवा की चिंता कर रही थी और तूने तो उसे दूध भी पिला दिया मैं तुम्हें शत शत नमन कर


हीरानंद यशोदा के यहां एक तत्व श्री भगवान के अनन्य भक्त थे उन्हें देखकर यशोदा मैया को बड़ा ही आनंद हुआ मैया ने बड़ी ही श्रद्धा भक्ति से ब्राह्मण के पैर धो कर उन्हें बैठने के लिए सुंदर आसन दिया कन्हैया को बुलाकर उन्होंने विप्र देवता के चरणों में साष्टांग प्रणाम करवाया कन्हैया को देखते ही ब्राम्हण गया था आश्चर्यचकित रह गए उनके नेत्र 1:00 तक छवि माधुरी में डूबते-उतराते रहे अपने आप को संभाल कर उन्होंने कहा यशोदा तुम्हारा लाला पर्यावरण बालक नहीं है यह तो कोई अवतारी पुरुष लगता है इसका सुयश गाकर झुकी-झुकी तक लोग भवसागर से तड़पते रहेंगे मैया ने कहा ब्राम्हण देवता आप कन्हैया को आशीर्वाद दें कि भगवान इसकी हर विपत्ति में रक्षा करें आओ ब्राह्मणों का आशीर्वाद अमोघ होता है इसीलिए आप इस बालक पर कृपा करें भगवन बचपन से ऊपर एक से एक विपत्ति आ रही है पता नहीं विधाता ने इसके भाग्य में क्या आया है ब्राह्मण ने कहा यशोदा तुम्हें इसकी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है यह बालक को विप्र तथा धर्म का अंगरक्षक होगा संसार की कोई विपत्ति इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगी इसका तो नाम लेकर लोग संपूर्ण विपत्तियों से मुक्त हो जाएंगे यह बालक दुष्ट संहारक तथा भक्त उद्धारक होगा कुछ लोग परांत यशोदा ने कहा भगवंतराव आप जो भी प्रसाद पाना चाहे बना ले मैं आपके इच्छा अनुसार व्यवस्था कर दूंगी विप्र देव ने खीर बनाने का ऊंचा प्रकट की और यशोदा जी ने तत्काल उनके आदेशानुसार सब चीजें सुलभ करवादी ब्राम्हण में भगवान का स्मरण करते हुए बड़ी ही प्रेम से भोजन बनाया भोजन थाल में निकालकर भगवान का ध्यान करते हुए यह कहने लगे प्रभु आप प्रसाद स्वीकार करें हम आंखें खोलकर देखते हैं किस श्यामसुंदर उनके सामने बैठ कर बड़े ही प्रेम से खीर का भोग लगा रहे हैं ब्राम्हणों ने क्रोधित होकर कहा यशोदा तुम कहां हो तुम्हारे लाला ने सारा प्रसाद जूठा कर दिया यशोदा ने कहा था यह बालक है आप इसके अपराध को क्षमा कर दें मैं पुनः सब कुछ ला देती हूं आप दोबारा भोजन बना ले दुबारा जब ब्राम्हण देवता ने भोजन बनाया हूं भगवान को निवेदन किया तो कन्हैया फिर खीर खाने लगे ब्राम्हण देव क्रोधित हो गए उन्होंने कहा यशोदा तुम्हारा लाला बड़ा नटखट है यह बार बार भोजन देखा है अब मैं तुम्हारे यहां भोजन नहीं करूंगा लो संभालो अपने लाला को मैं तो चलता हूं यशोदा ने ब्राह्मणों ने विनय करके विप्र देवता को मनाया और कन्हैया को डांटते हुए कहा कान्हा चौहान क्या चाहता है अतिथि बिना भोजन किए लौट जाएं कन्हैया ने कहा मां इसमें मेरा कोई दोष नहीं है यह बार-बार भूख लग मुझे बुलाते हैं क्या मंदिर में प्रसाद पाने लगता हूं तो नाराज हो जाते हैं ब्राम्हण देव भक्त होते ही वह प्रभु को पहचान कर उनके चरणों में गिर पड़े और कहा प्रभु क्या है वो मुझे क्षमा करें मैं आपको पहचान न सका यशोदा आवा हो गया हूं देखती ही रह गई एक दिन सब की सब गोपियां इकट्ठा होकर नंदबाबा के घर आए और यशोदा मैया को सुना सुना कर जो माल की करतूतें कहने लगी अरे यशोदा तेरा कान्हा बड़ा नटखट हो गया है गाय दुहने का समय ना होने पर भी यह हमारे घर जाकर हमारे बच्चों को खोल देता है हमारे डांटने पर यह नटखट हटाकर हंसने लगता है यह चोरी के बड़े-बड़े उपाय करके हमारा दूध नहीं आया और उड़ा चुरा कर खा 

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