Monday, 3 July 2017

Krishna Kathayein - Tales of Shri Krishna Part-1

करता ही नहीं था सभी धर्म के प्रेमी थे इसीलिए धर्म तथा अर्थ दोनों ही स्वतंत्र प्राप्त कर एक दिन महाबाहु राजा दुष्यंत आखेट के लिए अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ वन में गए उसे पार करने पर उन्हे महर्षि कण्व का आश्रम दिखाई पड़ा सबको आश्रम के द्वार पर ही रोक कर दुष्यंत अकेले ही आश्रम में गए आश्रम को सूना देख कर उन्होंने ऊंचे स्वर से पुकारा यह कौन है उनकी आवाज सुनकर लक्ष्मी जी के समान एक सुंदर कंया तपस्विनी के वेश में आश्रम से निकली थोड़ी देर वार्तालाप करने के बाद राजा दुष्यंत ने यह जान लिया कि यह शकुंतला नाम वाली राशि कन्या है राजा दुष्यंत उसके अनुपम रूप को देखकर उस पर मोहित हो गए राजा ने गंधर्व विधि से शकुंतला का पानी ग्रहण किया जिन्होंने शकुंतला को बार-बार यह विश्व शीघ्रातिशीघ्र उसे राजमहल में बुलवा लेंगे इस प्रकार कहकर पर अपनी राजधानी वापस आ गए समय पर आश्रम में ही शकुंतला कर गर्व से उत्तर उत्पन्न हुआ इस शिशु के जन्म लेते ही आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी देवगन तुम तुम भी आवाज आने लगे तथा अप्सराएं मधुर स्वर में गाती हुई नाचने लगी महर्षि कण्व ने विधिपूर्वक उसके जातकर्म आदि संस्का उनका सहारा भय जाता रहा माता देवकी ने कहा प्रभु पापी कंस को कहीं यह मालूम ना हो जाए कि आपका जन्म मेरे जन्म से हुआ है आपके लिए मैं कल से बहुत डर रही हूं आप अपने इस ग्रुप को छिपाकर बालक रूप में हो जाइए भगवान ने बेटी से कहा कि पूर्व जन्म में तुम्हारा नाम प्रश्न ही था और वसुदेव जी सतपाल नाम के प्रजापति थे तुम दोनों ने मुझे पुत्र रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की थी जब मैं प्रसन्न होकर तुम लोगों के सामने प्रकट हुआ तब तुम दोनों ने मुझे पुत्र रूप में पानी का वरदान मांगा मैं पहले जन्मे पृथ्वी गर्भ के नाम से तुम्हारा पुत्र हुआ दूसरे जन्म में तुम लोग कश्यप और अदिति हुए और मैं वामन रूप से तुम्हारा पुत्र हुआ जबकि इस बार फिर मैंने तुम्हारे गर्भ से अवतार लेकर अपनी वाणी की सत्यता को सिद्ध किया तुम लोगों को अपने पूर्व अवतारों का स्मरण दिलाने के लिए भी तुम्हारे सामने इस रुप में प्रकट हुआ हूं अब तुम लोग कंस के अत्याचार को समाप्त हिसार वात्सल्य सनेह से मेरे चिंतन से तुम दोनों को मेरे परम पद की प्राप्ति होगी अब तुम लोग शीघ्र ही मुझे गोकुल में लग रहे हो जाने की व्यवस्था करो तथा वहां से मेरी योग माया यशोदा के गर्भ से जन्म ले चुकी है उसे यहां ले आओ इतना कहकर भगवान चुप हो गए अब उन्होंने अपने माता-पिता के देखते झाले होते एक साधारण शिशु का रूप धारण कर लिया वसुदेव जी ने भगवान की आज्ञा से उन्हें गोकुल पहुंचाने की व्यवस्था की समय योग माया के प्रभाव से मथुरा के समस्त पुरवासी और द्वारपाल गहरी निद्रा में स्थित होकर सो गए बंदी ग्रह के सभी दरवाजे बंद थे उनमें लोहे की जंजीरें और मजबूत ताले लगे थे उसके बाहर जाना पड़ा ही कठिन था किंतु वसुदेव जी भगवान कृष्ण को गोद में लेकर यूं ही आगे बढ़े क्योंकि सब दरवाजे अपने आप खुलते चले गए ताले टूट कर गिर गए वसुदेव जी की हथकडी बेडी खुल गई जिस प्रभु के नाम स्मरण मात्र से संसार के सारे बंधन खुल जाते हैं वहां हथकडी बेडी और तारों की क्या कीमत है उस समय बादल धीरे धीरे गरजते हुए जल की फुहारें छोड़ रहे थे इसीलिए शीशा भगवान के सिर पर अपने होठों की


छाया करके वसुदेव जी के पीछे चलने लगे वर्षा का समय था यमुना जी बहुत बढ़ गई थी यमुना जी ने सोचा कि जिनके चरणों की धूलि के लिए बड़े-बड़े ऋषि मुनि रहती हैं वही मेरे तरफ आ रहे हैं यह सोच कर प्रसन्नता में उनकी आंखों से इतने आंसू निकले की बाढ़ आ गई उनका प्रवाह यह तेज हो गया जल में फैन ही फेल दिखाई दे रहा था सैकड़ों भयानक भंवरे पड़ रहा है जैसे ही वसुदेव जी श्री कृष्ण को लेकर यमुनाजी में उतरे उन्होंने चावल अपने जल को समेट लिया और श्रीकृष्ण को मार्ग देदिया कहीं-कहीं घुटनों चल रहे गया वसुदेव जी ने गोकुल में नंद बाबा के घर जाकर देखा कि सब के साथ होकर गहरी नींद में सो रहे हैं उन्होंने अपने पुत्र को यशोदा जी के बगल में सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को सुनकर मथुरा लाभ उठाएं बंदी ग्रह में पहुंचकर वसुदेव जी ने उस कंया को जन्मदिन की शैया पर सुला दिया और अपने हाथ पैर में हथकडी बेडी दांडेली बाहर भीतर सब दरवाजे जाओ अपने आप बंद हो गए इसके बाद कन्या के रोने की आवाज सुनकर द्वारपालों की नींद टूट गई चुल उड़ते हुए कंस के पास गए तथा देवकी को संतान होने की बात कही 10 बड़ी व्याकरण पर थे इस की प्रतीक्षा कर रहा था वह तुरंत पलंग से उठ खड़ा हुआ और कारागार की तरफ नंगी तलवार लिए हुए थे दिल से झांकता इस बार मेरे काल ने जन्म लिया है यह सोचकर कंस घबराया हुआ था उसके बाल बिखरे हुए थे तथा होंठ सूख रहे थे घबराहट में वह कई जगह गिरते गिरते बचा ने बंदी ग्रह में पहुंचते ही चिल्ला कर कहा देवकी कहां है वह बालक मैं अभी अपनी तलवार से काट कर जाओ उसके टुकड़े टुकड़े कर दूंगा ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी देवकी ने बड़े दुख और हम उनसे कहा मेरे प्यारे भाई यह तो कन्या है जो तुम्हारी भी पुत्री के समान है भला यह तुम्हें क्या मारेगी तुम्हे इसकी हत्या नहीं करनी चाहिए भैया तुमने एक-एक करके मेरे साथ पुत्रों को मार डाला मैंने तुमसे कुछ नहीं कहा मैं अपना अंचल पसारकर आज तुमसे इसके प्राणों की भीख मांगती हूं मैं तुम्हारी छोटी बहन हूं मुझ अभागिन पर दया करो यह मेरी अंतिम संतान है मैं दोनों हाथ जोड़कर तुमसे विनती करती हूं मेरे अरे भाई इसे तुम जीने का अधिकार दे दो यह मेरी अंतिम निशानी है जिसमें मैं तुमसे कुछ भी नहीं मांगूंगी कन्या को अपनी गोद में छिपाकर बड़ी दीनता के साथ देव की नहीं जाती है किंतु कंस बड़ा ही दुष्ट था उसके ऊपर देवकी की विनती का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा उसने देवकी को झटक दिया और कन्या को जबरदस्ती उसके आने से छीन लिया प्रकृति भी उसकी इस क्रूरता पर की कोठी सबके देखते देखते उस दुष्ट राक्षस ने अपनी भांजी का पैर पकड़कर जैसे ही चट्टान पर पटकना चाहा चाहे उसके हाथों से छूट कर आकाश में उड़ गई वह कन्या कोई साधारण तो थी नहीं साक्षात श्रीकृष्ण की योग माया थी आकाश में जाते ही वह देवी के रूप में बदल गई तथा अपने दिव्य स्वरूप में कंस को दिखाई पड़ी उसके 8 हाथ उन हाथों में त्रिशूल बाण ढाल तलवार शंख चक्र गदा सुशोभित थे वैधव्य माला चंदन तथा सुंदर आभूषण धारण किए थे देवता गंधर्व किन्नर और अप्सराएं उसकी स्थिति कर रहे हो उस देवी ने कंस से कहा रे मुर्ख मुझे मारने से तुम को क्या मिलेगा तुझे मारने वाला तेरा शत्रु कहीं और हो चुका है अब तू निर्दोष बालकों की हत्या मत कर मुझसे ऐसा कहकर


भगवती योग माया अंतर्ध्यान हो गई और विंध्याचल की बिंदिया ईश्वरी नाम से प्रसिद्ध जोगमाया की भविष्यवाणी सुनकर कंस को महान आश्चर्य हुआ उसने उसी समय वसुदेव देवकी को कारागार से छोड़ देने का आदेश दिया सनसनी वसुदेव देवकी से कहा मैं बहुत बड़ा पापी हूं मैंने भूलवश तुम्हारे बच्चों को मार डाला इस बात का मुझे कष्ट है मैं इतना दुष्ट हूं की तरह का मुझ में लेस भी नहीं है पता नहीं अब मुझे किस्मत में जाना पड़ेगा वास्तव में मैं तो जीवित होते हुए भी मुर्दे के समान हो लेकिन मेरा भी कोई दोष नहीं है सब जीव अपने प्रारब्ध के अनुसार ही सुख-दुख भोंकते हैं इसलिए तुम दोनों मेरे अपराध को क्षमा करो ऐसा कहकर कंस ने अपनी बहन और बहनोई के चरण पकड़ लिए वसुदेव और देवकी ने उसको क्षमा कर दिया योग माया के वचनों पर विश्वास कर वसुदेव देवकी को कारागार से छोड़ दिया गया क्या हम उनसे आदेश लेकर अपने महल चला गया कंस ने दूसरे दिन अपने दरबार में मंत्रियों को बुलाया और योग माया की सारी बातें हमें बताएं कंस के मंत्री व्यक्ति होने के कारण स्वभाव से ही क्रूर थे वह सब देवताओं के प्रति शत्रुता का भाव रखते थे अपने स्वामी कंस की बात सुनकर उत्सवों ने कहा यदि आपके शत्रु विष्णु ने कहीं और जन्म ले लिया है तो हम 10 दिन के भीतर जग में सभी बच्चों को आज ही मार डालेंगे हम आज ही बड़े-बड़े नगरों छोटे गांव अहीरों की बस्तियों और अन्य स्थानों में जितने भी बच्चे पैदा हुए हैं उन्हें समझ कर मारना शुरू कर देते हैं आपका शत्रु कहां जाएगा एक ना एक दिन हमारे हाथों मारा ही जाएगा आपके प्रताप से हमें एकांतवासी विष्णु वनवासी शंकर कायर इंद्र से कोई भी भय नहीं है फिर भी शत्रु को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए इसलिए इसे जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए आप हम जैसे सेवकों को आदेश दीजिए यदि पहले शत्रु की उपेक्षा कर दी जाए तो वह फॉर्म जमा बाद में उसे हराना कठिन हो जाता है अतः उसे शक्तिशाली होने से पहले ही समाप्त कर देना चाहिए देवताओं की जड़ है विष्णु और वह वहां रहता है जहां सनातन धर्म है सनातन धर्म की जड़ है वीर गांव जमुना तपस्या और यज्ञ अमिन का विनाश कर देंगे तो विष्णु अपने आप मर जाएगा एक तो कंस की बुद्धि वैसे भी बिगड़ी हुई थी दूसरे उसके मंत्री उससे भी अधिक दुष्ट थे उनकी सलाह में आकर कंस ने आदेश दिया ब्राम्हण गांव संत तथा अनुदिन या उससे अधिक दिन के बच्चे जहां भी मिले उन्हें तुरंत मार दिया जाए कि आदेश से दुष्ट नृत्य नवजात बच्चों को जहां बातें वही मार देते यज्ञ दान तप सदाचार कहीं दिखाई नहीं देते चंद्रपुर में भी उत्पाद शुरू हो गए अभी छठी के दिन भगवान का जार कर्म संस्कार ही हुआ था कि कैंसर के द्वारा भेजी गई पूतना श्री कृष्ण को मारने के लिए संत बाबा के घर पहुंची उसने सुंदर गोभी का वेश बनाकर श्रीकृष्ण को गोद में उठा लिया और अपने विश लगे स्तनों का दूध पिलाने लगी श्रीकृष्ण ने दूध के साथ उसके प्राणों को भी खींच लिया और उसे हम लोग भेज दिया एक दिन की बात है नन्हे से कन्हाई कॉलोनी में लेटे हुए अकेले ही कुछ वहां कर रहे थे और अपना हाथ पैरों को हिला रहे थे उसी समय कंस का भेजा हुआ एक दुष्ट राक्षस आओगे का वेश बनाकर उड़ता हुआ वहां आ पहुंचा विकराल था तथा अपने पंखों को फड़फड़ा रहा था उसकी सोच कितनी नुकीली और शक्ति 

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