शोषणमुक्त छत्तीसगढ़ के स्वप्नदृष्टा माधवराव सप्रे
केयूरभूषण
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के जनक पं. माधवराव सप्रे की 132वीं जयंती पहली बार समारोहपूर्वक आज मनाई जा रही है। सप्रेजी छत्तीसगढ़ को शोषण और पीड़ा से मुक्त देखना चाहते थे।
छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण, छत्तीसगढ़ की जनता के लिए स्वतंत्रता के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उसे विकसित करने की जिम्मेदारी इस अंचल की संपूर्ण जनता के साथ ही यहां के सभी मूर्धन्य नेताओं की है। उन्हें यह भी जानकारी रखनी चाहिए कि यहां की जनता ऐसा छत्तीसगढ़ चाहती है जो सुखी समृद्ध और शोषणमुक्त हो ताकि वह राष्टï्र के समग्र विकास में अपना भी योगदान दे सके। वस्तुत: छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की नींव, आज से एक शताब्दी पूर्व सन् 1900 मेंं पं. माधवराव सप्रे ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ नामक पत्रिका प्रकाशित करके रखी थी। उनकी कल्पना के छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण आज की पीढ़ी को करना है। इसके लिए ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के प्रवेशांक का संपादकीय प्रेरक हो सकता है।
सप्रे जी जिस अंचल में निवास करते थे उसके प्रति समर्पित थे। इस अंचल के शोषितजनों की पीड़ा उनके हृदय को विचलित कर रही थी। वह उनमें पुरुषार्थ जागृत करके उन्हें पीड़ामुक्त देखना चाहते थे। इसके पीछे उनकी किसी भी प्रकार की कोई निजी लालसा नहीं थी। न वे इस अंचल का नेतृत्व करना चाहते थे, और न ही किसी प्रकार का कोई व्यक्तिगत लाभ उठाना चाहते थे। इस अंचल में राष्टï्रीय जागरण के बीज अंकुरित करने वाले वह प्रथम व्यक्ति थे। मराठी भाषा तथा अंग्रेजी एवं संस्कृत के विद्वान होने के बाद भी रचनाधर्मिता के लिए उन्होंने हिन्दी को अपनाया। जब पं. सुंदरलाल शर्मा ने छत्तीसगढ़ में दानलीला की रचना की, तब इस अंचल के ही नहीं, देश के अनेक हिन्दी के विद्वानों में खलबली मच गई।
केयूरभूषण
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के जनक पं. माधवराव सप्रे की 132वीं जयंती पहली बार समारोहपूर्वक आज मनाई जा रही है। सप्रेजी छत्तीसगढ़ को शोषण और पीड़ा से मुक्त देखना चाहते थे।
छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण, छत्तीसगढ़ की जनता के लिए स्वतंत्रता के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उसे विकसित करने की जिम्मेदारी इस अंचल की संपूर्ण जनता के साथ ही यहां के सभी मूर्धन्य नेताओं की है। उन्हें यह भी जानकारी रखनी चाहिए कि यहां की जनता ऐसा छत्तीसगढ़ चाहती है जो सुखी समृद्ध और शोषणमुक्त हो ताकि वह राष्टï्र के समग्र विकास में अपना भी योगदान दे सके। वस्तुत: छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की नींव, आज से एक शताब्दी पूर्व सन् 1900 मेंं पं. माधवराव सप्रे ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ नामक पत्रिका प्रकाशित करके रखी थी। उनकी कल्पना के छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण आज की पीढ़ी को करना है। इसके लिए ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के प्रवेशांक का संपादकीय प्रेरक हो सकता है।
सप्रे जी जिस अंचल में निवास करते थे उसके प्रति समर्पित थे। इस अंचल के शोषितजनों की पीड़ा उनके हृदय को विचलित कर रही थी। वह उनमें पुरुषार्थ जागृत करके उन्हें पीड़ामुक्त देखना चाहते थे। इसके पीछे उनकी किसी भी प्रकार की कोई निजी लालसा नहीं थी। न वे इस अंचल का नेतृत्व करना चाहते थे, और न ही किसी प्रकार का कोई व्यक्तिगत लाभ उठाना चाहते थे। इस अंचल में राष्टï्रीय जागरण के बीज अंकुरित करने वाले वह प्रथम व्यक्ति थे। मराठी भाषा तथा अंग्रेजी एवं संस्कृत के विद्वान होने के बाद भी रचनाधर्मिता के लिए उन्होंने हिन्दी को अपनाया। जब पं. सुंदरलाल शर्मा ने छत्तीसगढ़ में दानलीला की रचना की, तब इस अंचल के ही नहीं, देश के अनेक हिन्दी के विद्वानों में खलबली मच गई।
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