Saturday, 15 July 2017

Subah Jaldi Uthane Ke 5 Fayade

क्या यार प्रिया मलिक टाइप करें देखने के लिए एंड पाली टू राइस मेक अ मैन हेल्थी वैल्यू एंड वाइफ यह लाइन बन रहा है लाइफ में सुन चुके होंगे आजकल की इस भागती दौड़ती जिंदगी में हम इतने ज्यादा बिजी हो गए हैं कि हमें रात में सोने का टाइम भी सही नहीं होता है ना ही सुबह उठने का टाइम होता है तो हमें अपनी दिनचर्या लाइफस्टाइल को सुधारना होगा अगर हम अपने सारी चीजों में अच्छा होना चाहते हैं अपनी हेल्थ को लेकर गलत को लेकर और डेवलपमेंट रहा हूं अपने आपको वह पांच अनोखे लेकिन जो आपके लिए बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट है पहला है मानसिक विकास यानि मेंटल डेवलपमेंट ऑफ फिटनेस सुबह के 4:00 ताजी हवा मिलती है साथ ही सूर्य कीपैड वीडियो माइंड कहां होती है उठकर एक्सरसाइज वाकिंग जोगिंग स्विमिंग कर सकते हैं उसका भी आपको टाइम मिल जाता है साथ ही ऐसे में सुबह के समय संचार होता है एनर्जी आती है जो पूरे दिन बनी रहती है जिसकी वजह से आपका शारीरिक और मानसिक विकास को बढ़ावा मिलता है साथिया बहुत ज्यादा हेल्प कहां है अपडेट रहना बहुत जरूरी होता है क्योंकि आपके देश में क्या चल रहा है आपके शहर में क्या चल रहा है पूरी तरीके से इंफॉर्मेशन आती है और हमारे हमारी बॉडी में एनर्जी बनी रहती है हमें महसूस नहीं होती है सुबह उठने के कारण हमारा वातावरण बिल्कुल शुद्ध शांत होता है जो हमारे मेंटल डेवलपमेंट के साथ साथ फिजिकल यानी बॉडी डेवलपमेंट के लिए भी जरूरी है

Tuesday, 11 July 2017

about al habib in hindi


अलविदा हबीब साहब


मुंह के थोड़े तिरछे कोण से लगा पाइप, अनूठे अंदाज मे निकलता धुंआ, सिर पर कैप, देखने मे थोड़ा बूढ़ा शरीर पर आवाज ऐसी बुलंद कि नौजवान शरमा जाएं और मंच पर जब यह शख्स प्रस्तुति के लिए उतरे तो तमाम कलाकारों पर ऐसा भारी पड़े कि दर्शक सिर्फ उसकी एक झलक के लिए उमड़ पड़ते थे ।

हिन्दुस्तान मे इस शख्स को हबीब तनवीर के नाम से लोग जानते हैं और थियेटर से जिनका थोड़ा भी परिचय है, उनके लिए वे सदैव आदर के पात्र हबीब साहब हैं पिछले कुछ दिनों से हबीब तनवीर की तबीयत की तबीयत ठीक नहीं चल रही थी लेकिन उसके प्रशंसकों को उम्मीद थी कि नाटकीय अंदाज में उनकी वापसी हो जाएगी। पर जिदंगी किसी नाटक से कम नहीं है जिसकी भूमिका खत्म हो गई, वह लौटकर नहीं आता ।

उनके नाटकों की धूम देश-विदेश में एक समान रही । किसी महान हस्ती के अवसान पर उसकी जिंदगी भर की उपलब्धियों पर चर्चा होना लाजिमी है, ऐसे में जब हबीब तनवीर के नाटकों बात हो और यह सोचा जाए कि किस नाटक का उल्लेख पहले करें, किसे सबसे प्रसिध्द मानें, तो चयन करना दुरूह कार्य प्रतीत होता है क्योंकि उनका हर नाटक कला का अनुपम नमूना होता था। वे उन लोगों मे से नहीं थे जो जनवादी चोला ओढ़कर सरकारी अनुदान पर क्रांति के नाटक करने का ढोंग रचते हैं उन्होंने थियेटर को सचमुच क्रांति का माध्यम बनाया था।

कुछ यादें : कुछ पुष्प


हबीब तनवीर
इप्टा की परम्परा को आगे बढ़ाया

दिसम्बर सर्दियों के दिन थे। कनाट प्लेस में हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। यह 1959 की बात है। सुरेश अवस्थी ने बताया ये हबीब तनवीर है। मैंने देखा सिर पर एक टिपिकल टोपी के साथ वे रेनकोट पहने हुए थे। पहली मुलाकात इस तरह हुई। कु छ समय पहले ही वे इंग्लैण्ड से वापस आए थे। उस समय मोहन राकेश भी साथ थे।

यह बात 1959 की है, फिर तो गोष्ठियों में नेमि जी, सुरेश अवस्थी, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, प्रयाग शुक्ल के साथ हबीब जी से अक्सर भेंट होने लगी। जोधपुर में इप्टा का सम्मेलन 1970 में हुआ था। उसमें हम तीन दिन साथ-साथ रहे।

उनको बहुत नजदीक से जानने और समझने का अवसर मिला। जोधपुर में उन्होंने ठेठ छत्तीसगढ़ी गीत सुनाए, बहुत अच्छा गाते थे हबीब तनवीर, मैंने आगरा बाजार नाटक सबसे पहले दिल्ली में देखा था। उसी समय 1960 में अल्का जी आए थे। अल्का जी का थियेटर और हबीब जी का थियेटर दोनों साथ-साथ निकले थे। एक ओर अल्का जी शेक्सपीयर से और इंग्लैण्ड से परम्परा लेकर आए थे। दूसरी ओर हबीब तनवीर ने इप्टा की परम्परा को आगे बढ़ाया। - नामवर सिंह

दिग्गज रंगसाधक का जाना एक अध्याय का अंत


सारी दुनिया में अपने गुण-धर्म को रंगमंच को नया मुहारवा देने वाले पद्मभूषण हबीब तनवीर का निधन बिरादरी व आमजन की नजर में एक अध्याय का अंत है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने तनवीर के निधन पर जारी शोक संदेश में कहा है कि उनके निधन से हिंदी और छत्तीसगढ़ी रंगमंच के एक अत्यंत सुनहरे युग का अंत हो गया।

संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, कृषि मंत्री चन्द्रशेखर साहू ने पद्मभूषण से सम्मानित सुप्रसिध्द रंगकर्मी एवं नाटय निर्देशक श्री तनवीर के निधन पर गहन शोक व्यक्त करते हुए कहा कि श्री तनवीर ने छत्तीसगढ़ की समृध्द कला को रंगमंच के माध्यम से विश्व में ख्याति दिलाई। गर्व की बात है कि श्री तनवीर रायपुर के निवासी थे।

रायपुर के हबीब तनवीर


खामोश हुए रंगमंच के फनकार

रायपुर की साँस और छत्तीसगढ़ की धड़कन हबीब साहब के दिल में बसती थी। अपने शहर रायपुर से भले ही दूर रहे हों, लेकिन इसकी याद हमेशा उनके साथ होती थी। परिवार की खैरियत हो या सहकर्मियों की चिंता, हबीब साहब कायम रखे हुए थे। अपनी जन्म भूमि से बेइंतहा मोहब्बत के साथ शहर में खेले गए नाटकों के मंच को भी वे पूरी शिद्दत से प्यार करते थे।

अपनी राजधानी के इस लाड़ले और प्रतिभाशाली कलाकार की दुनिया से विदाई पर पूरा शहर मानो गुमसुम सा हो गया है। घर में एलबम देखकर उनकी यादों को संजोते रिश्तेदार हो या उनके मार्गदर्शन में काम किए हुए कलाकार, सभी के जेहन में हबीब साहब की यादें ताजा रहेंगी।

रंगमंच के इस मुकम्मल फनकार के रग-रग में रायपुर बसता था। यही कारण है कि दूर जाकर भी अपने शहर से उनकी मोहब्बत हमेशा बरकरार रही। खास होकर भी आम होने की उनकी अदा के सभी कायल थे। उनके हुनर का जादू था कि रंगमंदिर से लेकर साइंस कॉलेज में उनके खेले गए नाटक दर्शकों के दिल में बस गए।

सप्रेजी के जीवन की आधारशिलाएं



सप्रे जी के समग्र जीवन पर एक विहंगम दृष्टिï डालने से ऐसा लगता है कि उन पर तीन महानुभावों के जीवन-दर्शन का पूर्ण प्रभाव पड़ा था। वे तीन महानुभाव थे विष्णुशास्त्री चिपुलणकर, बाल गंगाधर तिलक और गोपाल गणेश आगरकर। इनमें से चिपलुणकर तो हाई स्कूल की अध्यापकी छोडक़र मराठी भाषा की सेवा में हो गए और इसी उद्देश्य से मराठी भाषा में एक निबंध माला का प्रकाशन करने लगे। उन्होंने मराठी भाषा को प्राणवान बनाने के लिए अथक प्रयत्न किया और स्वदेश प्रेम की भावना भरने के लिए चोटी की पसीना एड़ी तक बहने दिया। दूसरे दो सज्जन-तिलक और आगरकर, चिपलुणकर के घनिष्ठï सहयोगी थे और देश के प्रति कर्तव्य पालन में ही अपने जीवन की सार्थकता मानते थे।

इस त्रिमूर्ति ने जिस प्रकार स्वार्थ का त्याग कर अविश्रांत परिश्रम करके मराठी भाषा को ओजस्वी, सामथ्र्यवान और संपन्न बनाया उसी प्रकार राष्टï्रभाषा हिंदी को भी सशक्त और सर्वगुण संपन्न, दोष रहित बनाना आवश्यक है- यह संकल्प सप्रे जी ने मन ही मन कर लिया। उन्होंने अपनी कार्य प्रणाली की रूपरेखा भी उसी अवसर पर निश्चित कर ली कि पहले बी.ए. तक शिक्षण प्राप्त कर डिग्री प्राप्त कर ली जाए जिससे उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सहायता मिले और कोई रुकावट न हो। वे चाहने लगे कि शिक्षा का निवियोग निरपेक्ष सेवा में हो, कोई बदला पाने की भावना न रहे। इससे उन्हें जो सुख मिलेगा वही सच्चा सुख है और सुख प्राप्त करना ही प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अंतिम लक्ष्य रहता है।

सप्रे जी की अभिलाषा : सप्रे जी ने हिंदी भाषा के संबंध में अपने संकल्प को सन् 1924 में देहरादून में आयोजित अखिल भारत हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति के आसन से इस प्रकार प्रकट किया था- ‘‘मेरे हृदय में राष्टï्रभाषा का भाव पैदा हुआ- अनुभव किया कि इस विशाल देश में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे सब प्रांतों के लोग अपनी राष्टï्रभाषा मानें और वह हिंदी भाषा को छोडक़र अन्य कोई नहीं है। मैं महाराष्ट्रीय हूं परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। मैं चाहता हूं कि इस राष्टï्रभाषा के सामने भारत वर्ष का प्रत्येक व्यक्ति वह यह भूल जाए कि मैं महाराष्टï्रीयन हूं, बंगाली हूं, गुजराती हूं या मदरासी हूं। ये मेरे पैंतीस वर्षों के विचार हैं और तभी से मैंने इस बात का निश्चय कर लिया है कि मैं आजीवन हिंदी भाषा की सेवा करते रहूंगा। मैं राष्ट्रभाषा को अपने जीवन में ही सर्वोच्च आसन पर विराजमान देखने का अभिलाषी हूं। ’

हिन्दी के समालोचकों द्वारा भुला दिए गए



पहले समालोचक : माधवराव सप्रे
सुशील कुमार त्रिवेदी

दोष किसका है, कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन स्थिति यही है कि एक मराठी भाषी जीवन भर निष्ठïा तथा एकाग्रता से हिन्दी की सेवा करता रहा, और हिंदी के इतिहासकारों ने उसे भुला दिया। जिस व्यक्ति ने हिंदी में समालोचना-लेखन की परंपरा की नींव डाली, सशक्त निबंधों की रचना की और कई महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, उसी व्यक्ति पं. माधवराव सप्रे का नाम पंडित रामचंद्र शुक्ल और उनके ग्रंथ को आधार बना कर ‘नकल नवीस इतिहासकार’ बनने वालों को याद नहीं रहा, यह एक भूल है या साहित्य-इतिहासकारों की साधन-दरिद्रता है?

पिछड़े इलाके का अगुआ

मध्यप्रदेश, जो आज भी पिछड़ा माना जाता है, उसी का एक और पिछड़ा इलाका छत्तीसगढ़ सप्रेजी की कर्मभूमि रहा, इसी क्षेत्र में उन्होंने आज से लगभग 75 वर्ष पूर्व हिन्दी आंदोलन शुरू किया था। उन्हें छत्तीसगढ़ की सोंधी मिट्टïी से इतना ममत्व था, इतना अनुराग था कि उन्होंने अपने साहित्यिक मासिक पत्र का नाम ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ रखा। यह वही छत्तीसगढ़ मित्र है जिसमें सबसे पहली बार हिंदी ग्रंथों की समालोचना प्रकाशित हुई। बनती संवरती रूप लेती हिन्दी में प्रकाशित होने वाले पहले ग्रंथों की पहली समालोचना को लिखने वाले सप्रे जी ही थे।

पेंड्रा (जिला-बिलासपुर) के राजकुमारों को पढ़ाने से मिलने वाले वेतन में से पैसा बचाकर सप्रे जी ने जनवरी 1900 में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन आरंभ किया। पं. श्रीधर पाठक, जिन्हें आचार्य शुक्ल ने ‘सच्चे स्वच्छंदतावाद का प्रवत्र्तक’ माना है, की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों,- ऊजड़ ग्राम, एकांतवासी योगी, जगत सचाई सार, धन-विजय, गुïणवंत हेमंत तथा अन्य, की विस्तृत विश्लेषणात्मक और विवेचनात्मक वैज्ञानिक समालोचना इसी पत्र में पहली बार प्रकाशित हुई। इसी प्रकार मिश्रबंधु तथा पं. कामता प्रसाद गुरु आदि तत्कालीन महत्वपूर्ण साहित्यकारों की कृतियों की समालोचना सप्रे जी ने ही लिखी। इसके अतिरिक्त पं. महावीर प्रसाद मिश्र, पं. कामता प्रसाद गुरु, पं. गंगा प्रसाद अग्निहोत्री, पं. श्रीधर पाठक आदि की रचनाएं प्राय: ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित होती रही।

कुछ वर्ष पूर्व एक ख्याति प्राप्त कहानी-मासिक (सारिका) पत्रिका में एक परिचर्चा प्रकाशित हुई, जिसमें माधवराव सप्रे द्वारा लिखित ‘एक टोकरी भर मिट्टïी’ को हिंदी की पहली मौलिक कहानी बताया गया था। यह कहानी ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में सन् 1901 में प्रकाशित हुई थी।

अर्थाभाव के कारण ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन दिसंबर, 1902 में बंद हो गया, पहले एक साल तक इसका मुद्रण रायपुर कैयूमी प्रेस में हुआ, किंतु बाद में यह नागपुर के देशसेवक प्रेस में मुद्रित होता था।

Long Small reactions story in hindi



'साहित्य वैभव' एक सुन्दर और परिपक्व प्रकाशन लगा। चित्रकला, फोटोग्राफी और मुद्रण आदि में जिसे कहा जाता है जो इसमें उत्कृष्टï है। यह एक सच्चाई है, औपचारिकता नहीं है। मैं यह भी मानता हूॅं कि आप भी अपनी पत्रिका को सजाने-सँवारने में पूरी कल्पना लगा देते होंगे। कभी आपसे मिला नहीं हूँ अत: आपके व्यक्तित्व को जानने का अवसर नहीं आया- साहित्य वैभव के माध्यम से जानने का अवसर एक उपलब्धि है। नक्सलवाद और उससे जुड़े विचारों से अवगत होने के लिए सदैव सजग रहा हूँ और यह भी जानता हूँ कि चारू मजुमदार ने यह आन्दोलन क्यों चलाया- चारू का उद्देश्य था जो धनाढ्ïय लोग हैं वे हमें एक म$जदूर के रूप में ही अपनाते हैं और कुछ नहीं, शोषण कर चोकर को फेंक देते हैं। चारू की मृत्यु अदालत ले जाते समय हो गई, हम सब मौन रहे। उस आन्दोलन को कुछ तथाकथित असामाजिक और विदेशी तत्वों ने अपने हाथ में ले लिया ओर बंगाल को आग में झोंक दिया जो कालान्तर में सारे देश में फैल गया जो निश्चित ही विदेशी तत्वों का भारत को कम$जोर करने का एक मन्तव्य है।

मैं आपके सम्पादकीय का समर्थन करता हूँ, नेहरू ने एक बार कहा था, हम बाहरी श्क्तियों से सामना तो कर लेते हैं किन्तु देश के अन्दर छुपे दुश्मनों से कैसे लड़ें।

प्रवीरचन्द्र भंजदेव को किस प्रकार मारा गया और उसे मारने के लिए उस समय के मुख्यमंत्री और उस समय की सरकार और सत्ता में बैठी सरकार का पूरा विवरण उसी समय सरिता (दिल्ली प्रेस) ने एक विशेषांक निकाला था। सम्भव है मेरे संग्रह में हो, कभी मिला तो विवरण दूँगा।दुष्यंत कुमार को सब लोग त्यागी कहा करते थे, मैं दुष्यंत कुमार कहा करता था और आज यह स्थिति है सारे समाज में त्यागी शब्द का लोप हो गया है। उनके जीवन के अधिकांश छायाचित्र मेरे खींचे हुए हैं। टाइम्स ऑफ इंण्डिया के प्रकाशन ''सारिकाÓÓ जो पहले सुचित्रा के नाम से प्रकाशित हुई थी में देखा जा सकता है। दुष्यंत कुमार ने जो यह कविता लिखी थी एक दस्तावेज है अपने आप को व्यवस्था के विरुद्घ बोलने के लिए आगे आने का। बाद तो कुछ ऐसा हुआ कि सत्ता लोलुप समाज के लोग उनकी कविताओं का अर्थ शासन तक पहुँचाते रहे।

- नवल जायसवाल, प्रेमन, बी 201, सर्वधर्म, कोलार रोड, भोपाल-462042

पत्रिका का आमुख सज्जा एवं भीतर के पृष्ठïों पर रेखाचित्रों का प्रयोग अच्छा हुआ है। एक-दो रेखाचित्र कहानियों में भी देना चाहिए था। गिरीश बख्शी की कहानी 'बदलावÓ एक प्रेरक रचना है। सकारात्मक सोच को उजागर करती यह कहानी बूढ़े व्यक्ति की बेहतरी के लिए आवश्यक संदेश दे जाती है। संपादकीय के तहत दुष्यंत कुमार की कविता पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया। आपके विचारों को रेखांकित करती है उनकी कविता। हिंदी को अपाहिज समझनेवालों के लिए डॉ. रवि शर्मा द्वारा लिखा गया लेख हिन्दी अपनाइये महत्वपूर्ण लगा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के कारागर जैसे संस्मरण प्रत्येक अंक में दें। कविताओं के चयन में थोड़ी सतर्कता बरतें। वैसे केशव दिव्य, नीलिमा कौशल, स्निग्धा की कविता एवं मुकुंद की $ग$जलें प्रभावित करती हैं। साहित्यिक समाचारों को कुछ कम करे, एक साहित्यिक भेंटवार्ता परिचर्चा भी प्रकाशित करें। आपने लघुकथा को स्थान देना आरंभ किया है, धन्यवाद लघु पत्रिकाओं के बीच 'साहित्य वैभवÓ अपना अलग पहचान बना रही है।

-सिद्घेश्वर, अवसर प्रकाशन, पोस्ट बॉक्स नं. 205, करविगहिया, पटना- 800001 (बिहार)

The journey of begusaraya



शीत का उत्कर्षकालीन समय था। प्रात: 4.45 बजे ट्रेन जिस स्टेशन पर रूकी, वह था बेगूसराय। छत्तीसगढ़ प्रदेश के किसी छोटे शहर के स्टेशन जैसा-इत्मीनान और सुकून से भरा। इक्के-दुक्के लोग आते-जाते दिखे, सूचित भाव से बतियाते हुए। किसी मेट्रो सिटी जैसे धड़धड़ाते, ऊपर-नीचे, आगे-पीचे, भागते-दौड़ते, गिरते-हपटते, छकियाते, रफ्तार पकडऩे की धून में पगलाए लोग नहीं थे यहां। गिने-चुने कुछ चेहरे या कहें कुछ साये।

अंधेरा पूरी तरह छटा नहीं था। हमारे पासदो सूटकेस और एक एयरबैग था। काव्यकोष्ठी में सम्मिलित होने और पुस्तक का विमोचन करने आए थे हम। ऊनी वस्त्रों और कम्बल सेहमारे (मेरे साथ पतिदेव श्री प्रदीप जी भी थे) हाथ-पैर, कान-मूंह सब ढंके थे, सिर्फ आंखें टुकुर-टुकुर देख रहीं थी इधर-उधर। नकाबपोशों जैसी हमारी वेशभूषा, पहनावा और हाथ का सूटकेस यह भ्रम उत्पन्न कर रहा था कि सूटकेस में कपड़े लत्ते और गोष्ठी में पढ़ी जाने वाली कविता न होकर चोरी-डकैती या फिरौती के रूपए होंगे।

रमण साहब आने वाले थे हमें रिसीव करने। पर अब तक आए नहीं थे, और जाने आ भी जाते तो हम पहचानते कि नहीं, क्योंकि हमारी तरह ही सबका हुलिया दिख रहा था। दो कदम आगे बढ़े तो अचानक कानों में चिर-परिचित आवाज सुनाई पड़ी। नमस्ते मैडम। आइए अग्रवाल साहब। इनसे मिलिए हमारी धर्मपत्नी हैं। सूटकेस नीचे रखकर हमने अभिवादन में अपने हाथ जोड़ें। रमण साहब (हमारे मेजबान) इस कडक़ड़ाती ठंड में 20 कि.मी. दूर गांव से सपत्नीक हमें लेने आये थे। हमारे न-न करतेरहने पर भी लगेज उन दोनों ने उठा लिया कौन कहता है भारत की संस्कृति, रस्म-रिवाज और बोल-चाल पीड़ी-दर पीढ़ी पीछे छूटती जा रही है?

अतिथि देवोभव: की संस्कृति लुप्तप्राय होती जा रही है? हम उनके साथ स्टेशन से बाहर आए। उनके साथ उनके कार में रवाना हुए। कुछ ही देर में उनके गांव पहुंच गए। गांव में आज उनके नवनिर्मित मकान का उद्घाटन समारोह था। हमें देखकर पूरा परिवार हरसिंगार की महक बिखेरता बिछ सा गया कॉफी आई। सबने गर्मागर्म काफी की चुस्की ली और फिर शाम को मिलने के वायदे के साथ हम सब रमण साहब के साथ होटल सायोनारा आ गए।

यहां आप रिलैक्स होइए। जो खाना हो आर्डर कर लें। हमारे आने की खुशी उनके चेहरे से झलक रही थी। मैं शाम को गाड़ी भेजूंगा। आकर इस मकान को घर बनाइए। उन्होंने निश्छल हंसी बिखेरी।

भाइयों में आज सुनाऊं, सप्रेजी की अमर कहानी



माधवराव के नाम से जुड़ी, हिंदी की यह जन्मकहानी
19 जून 1871 का पिथौरा में जन्म हुआ
कोडोपंत जी ने बच्चे को माधवराव नाम दिया
ओल्ड सी पी एंड बेरार में हिंदी सूर्य का उदय हुआ
1881 में माधव का दाखला अंग्रेजी स्कूल में हुआ
मिडिल में सर्वोच्च 7 रु. छात्रवृत्ति थी पानी
भाइयों मैं आज सुनाऊं, सप्रेजी की अमर कहानी
भारतियों को तब अंग्रेजी पढ़ाते दास बनाने को
लोग भी बच्चों को भेजते, भविष्य बनाने को
1890 में माधव ने एन्ट्रेस पास कर वजीफा पाया
साथ ही 18 वर्ष की आयु विवाह बंधन में पाया

1896 में उनके इंटर पास की खबर थी आनी
सुना रहा हूं, क्रमवार, सप्रेजी की अमर कहानी
कलकत्ते में जाकर ली, 1898 में बी ए की उपाधि
आकर हिंदी की सेवा में लग गया माधव
प्रथम हिंदी कहानी का लेखक कहाया माधव
सन 1900 की जनवरी में, पेंडरा के मासिक की कहानी
सुन लीजिए छत्तीसगढ़ मित्र के जन्म की कहानी
हर अंक विविधता पूïर्ण, कहानी थी कविता थी
लेख था, जीवन थी, पुस्तक समीक्षा भी थी
सब विधा युक्त था, संपादक सप्रेजी थे
छत्तीसगढ़ मित्र को तीन वर्ष सम्हाले सप्रेजी थे।

1906 में हिंदी ग्रंथमाला के प्रकाशन की ठानी
सुना रहा हूं, क्रमवार सप्रेजी की अमर कहानी
बाल गंगाधर तिलक का केसरी मराठी में था
पूरे भारत में विचार फैलाने हिंदी करना जरुरी था
1907 में नागपुर से हिंदी में केसरी प्रारंभ हुआ
इसी कारण लल्ली प्रसाद पांडेय जी से संपर्क हुआ
केसरी के अनुवादक को जेल की हवा थी खानी
1908 के समय की है यह सप्रेजी की अमर कहानी
मराठी के अद्भूत ग्रंथों का अनुवाद किया

Kauwa Aur Sone Ka Haar - कोआ और सोने का हार

जब एक बार कोयल बच्चों को जन्म दे रही होती है इसलिए वह कोए को बाहर भेज देती है. फिर थोड़ी देर बाद में कोए को अंदर बुलाती है. अंदर आते ही वह ...