Monday, 3 July 2017

Krishna Kathayein - Tales of Shri Krishna Part-4

हीरानंद यशोदा के यहां एक तत्व श्री भगवान के अनन्य भक्त थे उन्हें देखकर यशोदा मैया को बड़ा ही आनंद हुआ मैया ने बड़ी ही श्रद्धा भक्ति से ब्राह्मण के पैर धो कर उन्हें बैठने के लिए सुंदर आसन दिया कन्हैया को बुलाकर उन्होंने विप्र देवता के चरणों में साष्टांग प्रणाम करवाया कन्हैया को देखते ही ब्राम्हण गया था आश्चर्यचकित रह गए उनके नेत्र 1:00 तक छवि माधुरी में डूबते-उतराते रहे अपने आप को संभाल कर उन्होंने कहा यशोदा तुम्हारा लाला पर्यावरण बालक नहीं है यह तो कोई अवतारी पुरुष लगता है इसका सुयश गाकर झुकी-झुकी तक लोग भवसागर से तड़पते रहेंगे मैया ने कहा ब्राम्हण देवता आप कन्हैया को आशीर्वाद दें कि भगवान इसकी हर विपत्ति में रक्षा करें आओ ब्राह्मणों का आशीर्वाद अमोघ होता है इसीलिए आप इस बालक पर कृपा करें भगवन बचपन से ऊपर एक से एक विपत्ति आ रही है पता नहीं विधाता ने इसके भाग्य में क्या आया है ब्राह्मण ने कहा यशोदा तुम्हें इसकी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है यह बालक को विप्र तथा धर्म का अंगरक्षक होगा संसार की कोई विपत्ति इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगी इसका तो नाम लेकर लोग संपूर्ण विपत्तियों से मुक्त हो जाएंगे यह बालक दुष्ट संहारक तथा भक्त उद्धारक होगा कुछ लोग परांत यशोदा ने कहा भगवंतराव आप जो भी प्रसाद पाना चाहे बना ले मैं आपके इच्छा अनुसार व्यवस्था कर दूंगी विप्र देव ने खीर बनाने का ऊंचा प्रकट की और यशोदा जी ने तत्काल उनके आदेशानुसार सब चीजें सुलभ करवादी ब्राम्हण में भगवान का स्मरण करते हुए बड़ी ही प्रेम से भोजन बनाया भोजन थाल में निकालकर भगवान का ध्यान करते हुए यह कहने लगे प्रभु आप प्रसाद स्वीकार करें हम आंखें खोलकर देखते हैं किस श्यामसुंदर उनके सामने बैठ कर बड़े ही प्रेम से खीर का भोग लगा रहे हैं ब्राम्हणों ने क्रोधित होकर कहा यशोदा तुम कहां हो तुम्हारे लाला ने सारा प्रसाद जूठा कर दिया यशोदा ने कहा था यह बालक है आप इसके अपराध को क्षमा कर दें मैं पुनः सब कुछ ला देती हूं आप दोबारा भोजन बना ले दुबारा जब ब्राम्हण देवता ने भोजन बनाया हूं भगवान को निवेदन किया तो कन्हैया फिर खीर खाने लगे ब्राम्हण देव क्रोधित हो गए उन्होंने कहा यशोदा तुम्हारा लाला बड़ा नटखट है यह बार बार भोजन देखा है अब मैं तुम्हारे यहां भोजन नहीं करूंगा लो संभालो अपने लाला को मैं तो चलता हूं यशोदा ने ब्राह्मणों ने विनय करके विप्र देवता को मनाया और कन्हैया को डांटते हुए कहा कान्हा चौहान क्या चाहता है अतिथि बिना भोजन किए लौट जाएं कन्हैया ने कहा मां इसमें मेरा कोई दोष नहीं है यह बार-बार भूख लग मुझे बुलाते हैं क्या मंदिर में प्रसाद पाने लगता हूं तो नाराज हो जाते हैं ब्राम्हण देव भक्त होते ही वह प्रभु को पहचान कर उनके चरणों में गिर पड़े और कहा प्रभु क्या है वो मुझे क्षमा करें मैं आपको पहचान न सका यशोदा आवा हो गया हूं देखती ही रह गई एक दिन सब की सब गोपियां इकट्ठा होकर नंदबाबा के घर आए और यशोदा मैया को सुना सुना कर जो माल की करतूतें कहने लगी अरे यशोदा तेरा कान्हा बड़ा नटखट हो गया है गाय दुहने का समय ना होने पर भी यह हमारे घर जाकर हमारे बच्चों को खोल देता है हमारे डांटने पर यह नटखट हटाकर हंसने लगता है यह चोरी के बड़े-बड़े उपाय करके हमारा दूध नहीं आया और उड़ा चुरा कर खा


जाता है केवल दूध नहीं खाता तो कोई बात नहीं थी यह हमारे मटकों को भी पटक कर छोड़ देता है यदि घर में कोई वस्तु इसे नहीं मिलती है तो हमारे बच्चों को ही रुला कर भाग जाता है जब हम दूध दही ठीक ऊपर रख देती है जहां इसके हाथ नहीं पहुंचते हैं तब यह बड़े-बड़े उपाए कभी दो चार पीढ़ियों को एक दूसरे पर रख लेता है कभी Google पर चढ़ जाता है इतने पर भी इसका काम नहीं चलता है कहां हो तो बर्तनों में छेद कर देता है और सारा दूध दही गिराकर बर्बाद कर देता है ऐसा करके भी दिखाई करता है और हमें ही चोर बताता है तथा छुड़ाया हूं घर का मालिक बन जाता है मन ही मन प्रसन्न होते हुए तथा ऊपर से रोष प्रकट करते हुए गोपियों ने गोपाल की शिकायत की मां यशोदा निभाया ओ कान्हा तुम्हारी रोज-रोज की मैं तंग आ गई हूं इन गोपियों को देख ऐसे सेवर दिखा रही थी जैसे गोकुल की सारी गाय इन्हीं की हो गोपाल हमारे यहां आओ तो दही की क्या कमी है जो तू दूसरों के यहां जाता है आज से तुम इनके दरवाजे पर कभी मत जाना गोपाल ने कहा भैया यह सब खुद मुझे बुलाती है और ऊपर से शिकायत भी करती है आज से मैं यही खेलूंगा और इनके यहां कभी नहीं जाऊंगा मैया ने गोपाल को नहीं मानती सजाकर उनके हाथ में मुरली थमा दी और उन्हें माखन मिश्री खाने के लिए दिया उसके बाद मां ने कहा कान्हा देखो दूर मत जाना यही अपने घर के पास खेलना आजकल बरसात का मौसम है इसीलिए सांप बिच्छू अधिक हो गए हैं तुम कहां हो निकट मत जाना उनसे दूर रहना मां का आदेश मानकर गोपाल आंगन के बाहर आ गए वहां उन्होंने देखा कि सामने एक काला नाग सांप का फन निकालकर उनके सौंदर्य का रसपान कर रहा है गोपाल उसके साथ नाना प्रकार के खेल करने लगे नाग ब्राउन की मधुर बाल लीला का आनंद लेने लगा थोड़ी देर बाद कन्हैया को देखने के लिए यशोदा बाहर आई और गोपाल को नाग के साथ जाऊं खेल करते देख कर डर गई जल्दी से उन्होंने कन्हैया को नाक से दूर खींचा और कान पकड़कर उन्हें दम खाने लगी उन्होंने कहा कहा तुमने मेरा कहना नहीं माना और बाहर आकर नाक से खेलना शुरु कर दिया आज मैं तुम्हें दंड दिए बिना नहीं छोडूंगी कान्हा भयभीत नजरों से मां की तरफ से कहां जाऊं और क्षमा मांगने लगे काल भी जिन से भयभीत रहता है ऐसा हीरो की नात आजमा के सामने वह भी खड़े हैं एक बार मोहनचंद पीने के लिए मां यशोदा की गोद में चढ़ गए वात्सल्य स्नेह की अधिकता से मां के स्तनों से अपने आप दूध जलने लगा वह मोहन को दूध पिलाते समय उनका मंद मंद मुस्कान युक्त मुख निहारने लगी कितने में अंगीठी पर रखे हुए दूध में चुना गया उसे देखकर यशोदाजी मोहन को अतृप्त छोड़कर जल्दी से दूध उतारने के लिए चाहिए इससे मोहन को क्रोध आ गया उनके लाल लाल होठ फड़कने पास पड़े हुए लोहे से दही का मटका फोड़ डाला तथा वहीं पर उल्टा पड़ेगा में


Google पर चढ़ गए और चीन के पर रखा हुआ माखन बंदरों को बांटने लगे उन्हें यह भी डर लग रहा था कि कहीं मेरी चोरी खुल ना जाए साहब चौकन्ने हो कर चारों तरफ अतिथि यशोदा जी ने उठते हुए दूध को उतार कर एक तरफ रख दिया फिर दूसरे घर में आए वहां देखती हैं की दही का बनना टुकड़े टुकड़े हो गया है वह समझ गई कि यह सब मेरे लाला की करतूत है इधर उधर ढूंढने पर यशोदा मैया ने देखा कि श्री कृष्ण चौहान कल पर खड़े हैं और मटकों से माखन निकाल-निकालकर बंदरों को बंदर भी बड़े ही प्रेम से कन्हैया से हाथ से माखन लेकर आ रहे हैं मानो जन्म-जन्मांतर के भूखे हो क्या ओके क्यों नहीं रहते उन्हें परमात्मा के हाथ का प्रसाद जो मिल रहा था इसके लिए कई जन्मों तक उन्होंने तपस्या की थी तब जाकर यह दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ था वह कल पर निश्चिंत खड़े होकर श्री कृष्ण माखन बांट रहे थे मानो रामावतार में जो वनडे का वितरण बाकी रह गया था उसे पूरा कर रहे हो यह देखकर यशोदा जी को दबाए हुए पीछे से धीरे-धीरे उनके पास जा पहुंचे जब श्री कृष्ण ने अपनी मां को हाथ में छड़ी लिए हुए देखा तो ओखली पर से छीनकर भागे बड़े-बड़े ऋषि मुनि जन्मों की तपस्या के बाद भी जिन भगवान की लीला में प्रदेश नहीं पाते हैं उंहीं भगवान को पकड़ने के लिए यशोदा जीत गढ़ी उनके हाथ में छड़ी थी तथा उनकी आंखे क्रोध से लाल की जय श्री कृष्ण अपनी भयभीत आंखों से मां की तरफ देख रहे थे उन्होंने सोचा कि जब माही पीटने के लिए तैयार है तो मुझे कौन बचाएगा उनके नेत्र भय से व्याकुल हो रहे थे चाहने डांटते हुए कहा अरे वानर बंद हो पाखंड कहां से मिलेगा श्रीकृष्ण ने दूर से ही कहा है मैया मुझे मत मार माता ने कहा लाला यदि पीटने का इतना ही बैठा तो मटका ही क्यों छोड़ा श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं क्या हूं अब मैं ऐसा कभी नहीं करुंगा तू अपने हाथ की छड़ी नीचे डाल दे मां ने कहा आज तो मैं तुझे ऐसा दंड दूंगी कि तू ना तो ग्वाल बालों के साथ खेल सकेगा है और ना माखन चोरी का उधम ही मचा सकेगा भला यदि कोई असर अस्त्र शस्त्र लेकर बान सुदर्शन चक्र का स्मरण करते किन मैया की छड़ी के लिए उनके पास कोई उपाय नहीं था वह मां के वात्सल्य स्नेह से जो बच्चो थे आखिर गोपाल पकड़े गए यशोदा ने कहा कि मैं तेरी शरारतों से तंग आ चुकी हूं आज तो मैं तुझे ऐसा दंड दूंगी कि तू जिंदगी भर याद रखेगा इसके बाद उन्होंने सोचा कि अबकी बार इसे रस्सी से बांध देना चाहिए खदेड़ने पर यह कहां-कहां वन वन भूखा प्यासा रहेगा इसीलिए थोड़ी देर के लिए इसे रस्सी से बांध रहा हूं दूध माखन तैयार होने पर फिर इसे मना लूंगी जब मैं यशोदा अपने नटखट गोपाल को रस्सी में बांधने में लगी तब वह दो अंगुल छोटी पड़ गई इसके बाद उन्होंने दूसरी रस्सी जोड़ी और वह भी छोटी पड़ गई है और कार्य रस्सी पर रस्सी जोड़ती गई किंतु वह सब मिल कर भी दो दो अंगुल छोटी छोटी हो यशोदा नगर क्या जो डाली फिर भी वह मोहन को नहीं बांध सकें विभाजन सोचने लगी मुट्ठी भर की तो इसकी कमर है फिर भी सैकड़ों हाथ लंबी रस्सी से यह याद आता है हर बार दो अंगुल की ही कमी रहती है ना


3 की न 4 की चालीसा अलौकिक चमत्कार है यशोदा जी आश्चर्यचकित रह गई गोपाल ने देखा क्या मेरी मां का शरीर पसीने से लतपथ हो गया है मैं थक गई है कृपा करके स्वयं बंद करें भगवान श्रीकृष्ण इतने कोमल हृदय हैं कि अपने भक्तों के प्रेम को पुष्ट करने वाला थोड़ा भी परिश्रम छाया नहीं कर सकते और भक्त को परिश्रम से मुक्त करने के लिए स्वयं ही बंधन स्वीकार कर लेते हैं भक्त कार्यक्रम और कृपा की कमी यही दो अंगुली की दूरी है जब भक्त यह सोचता है कि मैं अपने परिश्रम से भगवान को मांग लूंगा तब वह भगवान से एक अंगुल दूर हो जाता है और भगवान अपनी कृपा को समेटकर उससे एक अंगुल और दूर हो जाते हैं जब मां ने देखा तो गोपाल बंद कर नहीं नहीं जा सकते फिर घर के काम धंधों में लग गई ओखल में बंधे हुए गोपाल ने उन दोनों अर्जुन वृक्षों को शांति देने पहले यक्षराज कुबेर के पुत्र थे इनके नाम थे नलकुबेर और मणि गरीब इनके पास धन ऐश्वर्य और सौंदर्य की कोई कमी नहीं थी इनका घमंड देख कर ही देव ऋषि नारद ने इन्हें श्राप दिया था और वह वृक्ष हो गए थे भगवान श्री कृष्ण ने सोचा यह दोनों मेरे प्रिय भक्त कुबेर के पुत्र हैं इन्हें वृक्ष योनि से मुक्त करना चाहिए इसीलिए श्रीकृष्ण ने धीरे धीरे धीरे चल खिसकाते हुए दोनों वृक्षों के बीच बढ़ा दिया दामोदर भगवान गोपाल की कमर में रस्सी कसी हुई थी उन्होंने ऊखल को यूंही तनिक जोर से खींचा क्यों ही वृक्षों की जड़े हिल गई दोनों Facebook बड़े जोर से तड़ तड़ आते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े उन दोनों से अग्नि के सामान चाहिए तेजस्वी पुरुष निकले उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे भगवान श्री कृष्ण ने कहा तुम लोग श्रीमद् से अंधे हो रहे थे देव श्री नारद ने जान देकर भी तुम्हारा कल्याण ही किया था इसीलिए नलकुबेर और मणि गरीब तुम लोग अब अपने घर जाओ तुम्हें माया मोह से छुड़ाने वाली मेरी भक्ति प्राप्त होगी यहां पर कुछ पढ़ने वाला हूं नहीं कुछ संस्कृत में बोलने वाला हो मैं तो वही भाषा में बात करुंगा दोस्तों कि जो हम सभी समझ सकते हैं क्योंकि मुझ में छोड़ा हमें कोई फर्क नहीं है मैं कोई संत महात्मा नहीं हूं ना ही कोई गुरु नहीं कोई टीचर नहीं कोई प्रोफेसर मुझ में और आप में कोई फर्क नहीं दोस्तो बस दो अच्छी बातें कहीं से मैंने जानी है जो आज मैं आपके साथ यहां पर शेयर करने वाला हूं और यह जो हमारा प्रोग्राम है जो 4 दिन का है ग्राम है उसका सबसे पहला पाठ है दोस्तों लाइफ ऑफ कृष्ण है यानि की कृष्ण भगवान जिंदगी से आज हमें यहां पर काफी कुछ जानना है दूसरा है कृष्ण एंड महाभारत यानि की कृष्ण का रोल महाभारत में किस तरह से रहा था वह हमें जानना है अल्टीमेटली दोस्तों जो लास्ट पार्ट अपना होता है वही भागवत गीता अध्याय 3 पाठ में अपना प्रोग्राम डिवाइडेड है और आज हम शुरुआत करेंगे दोस्तो लाइफ ऑफ कृष्ण के द्वारा वाइफ दोस्त कहां है सबसे पहले तो मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में एक बहुत ही ब्यूटीफुल रिसर्च हुआ था और वो रिश्ते चाहिए था कि जितने भी संत महात्मा या भगवान इस संसार में आ चुके उन सभी ने कैसे-कैसे पावर जूते उसने पाया जा कर जैसे एक नॉर्मल इंसान हम सभी ऐसा कहा जाता है कि वह लाइफ के थर्ड लेवल पर जी रहे हैं तीसरे लेवल पर अब आप कहेंगे थर्ड लेवल मतलब क्या है बहुत ही सिंपल हे दोस्तों हम एक शब्द समझते हैं इवोल्यूशन क्रांति उसमें सबसे पहले लेवल पर हे पेड़ पौधे दूसरे लेवल पर हे जानवर तीसरे लेवल पर हम इंसान हैं वह अब आप समझ पा रहे हैं ठीक है तो दोस्तों ऐसा कहा गया कि स्वामी विवेकानंद किचन का नाम तो हम सभी लोग जानते हैं दोस्तों उनके लिए कहा गया कि वह लाइफ के छठे लेवल पर ही रहते शिक्षण यानी कि दोस्त एक नॉर्मल इंसान से कई गुना पावरफुल वाइट उसी के साथ जैसे मैं आपको कहूं के दोस्तों आप चाहो तो भगवान का नाम सुना है यह गौतम बुद्ध हम कहते हैं 

Krishna Kathayein - Tales of Shri Krishna Part-3

नित्य नई-नई लीलाएं करके को आनंदित करना था पूर्व जन्म में नंदबाबा और यशोदा मैया ने जान की उपासना करके भगवान से पुत्र रूप में वात्सल्य सुख की ही तो प्रार्थना की थी भगवान उस इच्छा को अधूरी कैसे रहने देते इसलिए वह नृत्य नवीन पांडे लीला से मां को रिझाने का प्रयास करते थे कान्हा नंद के चरणो मे आंगन में घुटनों के बल कि अधिकारी मारते हुए खेल रहे थे अचानक उनकी दृष्टि अपनी परछाई पर पड़ी तो उन्हीं का अनुकरण कर रही थी क्या जब भी हंसते तो परछाई हंसती थी जब चलते तो परछाई चलती थी कन्हैया बहुत खुश हुए सोचा चलो एक नया साथी मिल गया घर में अकेले खेलते खेलते मेरा मन खुश हो जाता है अब यह रोज मेरा मन बहलाया करेगा कन्हैया अपनी परछाई से बोले भैया तुम कहां रहते हो चलो हम दोनों मित्र बन जाएं कहां हो जब मैं माखन खाऊंगा तो तुम्हें भी खिलाऊंगा जब दूध पियूंगा तो तुम्हें भी पिलाऊंगा चलाओ भैया मुझसे बड़े हैं इसलिए वह मुझसे लड़ जाते हैं तुम मुझसे लड़ना नहीं हम लोग खूब प्रेम से रहे हो देखो ना यहां किसी भी चीज की कोई कमी नहीं है तुम्हें गाना माखन मिश्री चाहिए मैं तुम्हें मैया से कहकर दिला दूंगा आओ हम दोनों आपस में गले मिल ले ताकि आज से मित्रता अच्छा हो जाए इस प्रकार कहते हुए कन्हैया बार-बार अपनी छत जीने का प्रयास करने लगे बार-बार आगे पीछे इधर-उधर घूमते किंतु परछाई किसी की पकड़ में आई है क्या कि कन्हैया की पकड़ में आ जाती जब थक कर हार गए किसी प्रकार भी ना पकड़ सके तो दुखी हो गया यार श्याम के दुखी हो परछाई भी दुखी दिखाई देने लगी अपने लाल का मुखड़ा गाना देखकर यशोदा मैया नजदीक गई ध्यान से उन्होंने कन्हैया की तरफ देखा कन्हैया की आंखें डबडबा आई उन में आंसू भर गए हैं उनका आंचल पकड़कर सुबक सुबक कर रोने लगे मां ने पूछा कन्हैया तुम्हे क्या हो गया तुम क्यों रो रहे हो क्या है श्रीकृष्ण ने माता को अपना प्रतिबिंब दिखाकर बात बदल दी जय श्री कृष्ण बोले मैया मैया यह कौन है क्या वह लोग वह तुम्हारा माखन चुराने के लिए घर में घुस आया है मैं बार-बार मना कर मानता ही नहीं मैं क्रोध करता हूं तो यह भी क्रोध करता हूं मैया आओ ना हम दोनों मिलकर इसे बाहर कर दें नहीं तो यह तुम्हारा सब माखन खा जाएगा मैया कन्हैया के इस भोलेपन पर मुक्त हो गई क्या और कंहैया के आंसू पोंछ कर उन्हें गोद में ले लिया एक दिन माता यशोदा दही मत कर माखन निकाल रही थी अचानक मां को आनंद देने के लिए बल राम और श्याम उनके निकट पहुंच गए कन्हैया ने मटकी फोड़ी पकड़ ली और बलराम ने मोतियों की माला दोनों मां को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करने लगे बलराम कहते थे मां पहले तुम मेरी सुनो और कंहैया कहते थे नहीं मां पहले तुम मेरी सुन मैया मुझे बड़ी जोरों की भूख लगी है भूख से हारा बुरा हाल है चलो ना जल्दी से मुझे माखन रोटी दे दो देखो ना आए हैं खेलते खेलते बिल्कुल ही थक गया हूं मैं माखन रोटी खाकर जल्दी से सो जाना चाहता हूं यशोदा जी ने कहा बेटा दूध पी लो या घर में नाना प्रकार के पकवान बने हैं जो तुम्हारी इच्छा हो खा लो कन्हैया ने कहा नहीं मैं तो केवल माखन खाऊंगा मेवा पकवान तो मुझे बिल्कुल अच्छे नहीं लगते जब तक तुम मुझे माफ कर नहीं दे दोगी तब तक मैं तुम्हारी छोटी खींचता ही रहूंगा मां ने कहा


कन्हैया अगर तू माखन खाएगा तो तेरी यहां आओ छोटी रह जाएगी कभी नहीं बढ़ेगी कन्हैया ने कहा मां तू दाऊद आपको तो कभी मना नहीं करती मैं तो जब भी मांगते हैं तब उन्हें माखन नहीं होने देती हो मुझे क्यों नहीं दे रही हो मैंने कहा कान्हा देखो पहले मैं दाऊ को भी माखनलाल नहीं देती थी वह भी मेवा पकवान खाता था और दूध पीता था तभी तो उसकी छोटी लंबी हड्डी है यदि तुम भी दूध पियोगे तो तुम्हारी भी छोटी लंबी हो जाएगी जाओ मेरे लाल अच्छे बच्चे जिद नहीं करते जाकर पद्मगंधा गाय का दूध रखा है पी लो मैंने कहा मां बोलती है कितने साल तो मुझे दूध पीते होंगे मेरी छोटी बिल्कुल नहीं बढ़ी आज तुम्हारा बहाना नहीं चल सकता Tumhe मुझे माखन रोटी देनी ही पड़ेगी मैया ने कहा गाना डाउ अब बड़ा हो गया है इसमें कौन से अधिक दिनों तक दूध पिया है इसीलिए दाव की चोटी बढ़ गई जब तुम भी उतने ही दिनों तक दूध पी लोगे तब तुम्हारी भी छोटी उतनी ही बढ़ जाएगी कन्हैया ने कहा मैया हम यह सब मैं नहीं सुनूंगा तुम साफ-साफ बताओ रोटी देती हो कि नहीं यदि तुम माखन रोटी नहीं दोगी तो आज से मैं तुमसे नहीं बोलूंगा ना तुम्हारी गोद में ही आऊंगा अब दाऊजी तुम्हारे पुत्र हैं मैं भला तुम्हारा क्या लगता हूं क्या माता यशोदा ने कहा कान्हा तू मेरा प्राण है हृदय है तेरे बिना भला हम कैसे रह सकती हूं मेरे नन्हे लाल मैं तेरी बलिया लेती हूं कृपया तुम्हें अधिक भूख लगी है ना मुझे मक्खन निकाल लेने दो फिर तुझे जितना माखन चाहिए ले लेना अब तो खुश हो जाओ सरकार मां यशोदा मानो कंठक वात्सल्य समय में डूब गई उनकी आंखों से प्रेमाश्रु पड़े यशोदा मैया धन्य है त्रिभुवन का भरण पोषण करने वाले प्रभु उनके आगे माखन के लिए बार-बार हमें इज्जत करते हैं यशोदा मैया से बड़ा सौभाग्य भला किसका होगा एक बार भगवान श्यामसुंदर ग्रुप कुमारों के साथ खेल रहे थे श्रीदामा बलराम तथा मनचला हाथी उनके साथ है 10 मई क्रीडा का आनंद ले रहे थे इस खेल में एक बालक दूसरे के हाथ में चोट ताली मार कर भागता और दूसरा उसे पकड़ने का प्रयास करता था बलराम ने कहा मोहन तुम मत भागो तुम अभी छोटे हो तुम्हारे पैरों में चोट लग जाएगी मोहन ने कहा दाऊ भला ऐसे कैसे हो सकता है कि मैं अपने साथियों के साथ खेल में हिस्सा ना लूं मैं दौड़ना जानता हूं मेरे शरीर में बहुत बल है मेरी जोड़ी श्रीदामा है क्या मेरे हाथ में ताली मारकर भागेगा और मैं उसे पकड़ लूंगा श्रीदामा ने कहा नहीं तुम मेरे हाथ में ताली मार कर भागो मैं तुम्हें पकड़ता हूं जिस प्रकार भगवान श्यामसुंदर सुदामा के हाथ में ताली मार कर भागी और सुदामा उन्हें पकड़ने के लिए उनके पीछे पीछे दौड़ा दूर जाकर ही उसने श्याम सुंदर हो कर लिया श्याम सुंदर ने कहा मैं तो जानबूझकर खड़ा हो गया हूं तुम मुझे क्यों रोते हो ऐसा कहकर श्याम श्रीदामा से झगड़ने लगे सुदामा ने कहा पहले तो तुम जोश में आकर दौड़ने खड़े हो गए और जब हार गए तो झगड़ा करने लगे बलरामजी बीच में बोल पड़े इसके तो नाम आता है ना पिता ही नंदबाबा और यशोदा मैया ने इसे कहीं से बोल लिया है यह हार जीत का लिंग भी नहीं समझता स्वयं हारकर सखाओं से झगड़ पड़ता है ऐसा कह कर उन्होंने कन्हैया को डांटकर घर भेज दिया कि हम रोते हुए घर पहुंचे यशोदा मैया रोने का कारण पूछने लगी मोहन ने रोते मे कहा मैया दाऊ दादा ने आज मुझे


बहुत ही चढ़ाया वह कहते हैं कि तू मोह लिया हुआ है यशोदा मैया ने भला तुझे जन्म कब दिया मैया मैं क्या करूं इसी क्रोध के मारे खेलने नहीं जाता दो ने मुझसे कहा कि बता तेरी मां का कौन है कर्ता कौन है नंदबाबा को गोरे हैं और यशोदा मैया भी गोरी है फिर तू सावला कैसे हो गया ग्वाल बाल भी निरहू की लेते हैं और मुस्कुराते हैं तुमने भी केवल मुझे ही मरना सीखा है जान दादा को तो कभी डांटती भी नहीं मैया कन्हैया के आंसू पोंछते हुए बोली मेरे प्यारे मोहन बलराम तो चुगल खोर है वह जन्म से ही धूर्त है तू तो मेरा हमारा लाल है काला कह कर दो तुम्हें चढ़ाता है तुम्हारा शरीर तो इंद्रनील मणि से बाहर है भला तो तुम्हारी बराबरी क्या करेगा श्यामसुंदर मैं गायों की शपथ लेकर कहती हूं कि मैं तुम्हारी माता हूं और तुम ही मेरे पुत्र हो जय हो गोपाल का गायों से प्रेम तो निराला ही था गायों का गोकुल में जन्म भी उनके अनेक जन्मों का पुंय का परिणाम था वह कितनी भाग्यशाली नहीं थी जय श्री कृष्ण का कुछ कार भरा नहीं मिलता था गोपाल बार-बार अपने पिक गायों के शरीर की धूल साफ करते तथा उन्हें अपने कोमल हाथों से कहलाते थे गायों को भी श्रीकृष्ण को देखे बिना चेन नहीं मिलता था वह बार-बार श्री कृष्ण किशन की लालसा से नंद भवन के मुख्य दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देख सकती ताकि जैसे ही श्रीकृष्ण निकले वह अपनी आंखों को उनके दर्शन से तृप्त कर सकें जब भी मोहन बाहर निकलते गाय उनके शरीर को अपनी जीभ से चाट चाट कर अपना पूर्ण वात्सल्य उनके ऊपर उड़ती रहती थी गाय भी यशोदा मैया से कम भाग्यशालिनी नहीं थी क्योंकि उन्हें कन्हैया को अपना दूध पिलाने का अवसर प्राप्त हो रहा था और बदले में कन्हैया का प्रेम मिल रहा था गोकुल या ब्रिज में रज करो जी बन जाना बहुत बड़े सौभाग्य की बात है रसखान उनसे याचना करते हुए कहा है जो पशु हो तो कहा बसु मेरो करो नित्य नंद की धेनु मजारे वाहन हो तो वही गिरी को जो तेरे होकर शंकर पुरंदर धारण कन्हैया गायों को मां की तरह ही प्यार करते थे इसी से मौका मिलते ही उनके पास चले जाते थे एक दिन कन्हैया सुबह-सुबह नंद भवन से गौशाला में पहुंच गए वहां पर एक गाय उन्हें अपना दूध पिलाने के लिए उनकी प्रतीक्षा कर रही थी वह वात्सल्य स्नेह से उस गाय का दूध अपने आप हो रहा था गाय की दृष्टि एकटक नंद दरवाजे पर लगी थी ताकि श्री कृष्ण बाहर निकले और वह उन्हें अपना दूध पिला कर अपना जीवन सार्थक कर सके कन्हैया उसके परिणाम प्रेम की उपेक्षा भला कैसे करते आनंद भवन से निकलकर गौशाला में सीधे उस गाय के पास पहुंचे और उसके थन में जाम लगाकर उसका दूध पीने लगे इधर यशोदा जी कन्हैया को चारो तरफ अभी बार-बार भोपाल को कान्हा ओ कान्हा तू कहां गया अरे जल्दी से आ भी जा रहा हूं मैं कब से तेरी प्रतीक्षा कर रही हूं लेकिन कन्हैया होता तब ना सुनता वह तो अपनी गैया मां का दूध पी रहा था यशोदा उसे पुकारती हुई सोच रही थी पता नहीं लाला कहां चला गया उसने अभी तक कलेवा भी नहीं किया है खिड़की से बाहर झांक कर उन्होंने देखा कि ताना दिया माता के थन में मुंह लगाकर दूध पी रहा है गाय कन्हैया का शेर नहीं है यशोदा मैया ने कहा कि गैया मां तू धन्य है वह तो अभी कन्हैया के कलेवा की चिंता कर रही थी और तूने तो उसे दूध भी पिला दिया मैं तुम्हें शत शत नमन कर


हीरानंद यशोदा के यहां एक तत्व श्री भगवान के अनन्य भक्त थे उन्हें देखकर यशोदा मैया को बड़ा ही आनंद हुआ मैया ने बड़ी ही श्रद्धा भक्ति से ब्राह्मण के पैर धो कर उन्हें बैठने के लिए सुंदर आसन दिया कन्हैया को बुलाकर उन्होंने विप्र देवता के चरणों में साष्टांग प्रणाम करवाया कन्हैया को देखते ही ब्राम्हण गया था आश्चर्यचकित रह गए उनके नेत्र 1:00 तक छवि माधुरी में डूबते-उतराते रहे अपने आप को संभाल कर उन्होंने कहा यशोदा तुम्हारा लाला पर्यावरण बालक नहीं है यह तो कोई अवतारी पुरुष लगता है इसका सुयश गाकर झुकी-झुकी तक लोग भवसागर से तड़पते रहेंगे मैया ने कहा ब्राम्हण देवता आप कन्हैया को आशीर्वाद दें कि भगवान इसकी हर विपत्ति में रक्षा करें आओ ब्राह्मणों का आशीर्वाद अमोघ होता है इसीलिए आप इस बालक पर कृपा करें भगवन बचपन से ऊपर एक से एक विपत्ति आ रही है पता नहीं विधाता ने इसके भाग्य में क्या आया है ब्राह्मण ने कहा यशोदा तुम्हें इसकी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है यह बालक को विप्र तथा धर्म का अंगरक्षक होगा संसार की कोई विपत्ति इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगी इसका तो नाम लेकर लोग संपूर्ण विपत्तियों से मुक्त हो जाएंगे यह बालक दुष्ट संहारक तथा भक्त उद्धारक होगा कुछ लोग परांत यशोदा ने कहा भगवंतराव आप जो भी प्रसाद पाना चाहे बना ले मैं आपके इच्छा अनुसार व्यवस्था कर दूंगी विप्र देव ने खीर बनाने का ऊंचा प्रकट की और यशोदा जी ने तत्काल उनके आदेशानुसार सब चीजें सुलभ करवादी ब्राम्हण में भगवान का स्मरण करते हुए बड़ी ही प्रेम से भोजन बनाया भोजन थाल में निकालकर भगवान का ध्यान करते हुए यह कहने लगे प्रभु आप प्रसाद स्वीकार करें हम आंखें खोलकर देखते हैं किस श्यामसुंदर उनके सामने बैठ कर बड़े ही प्रेम से खीर का भोग लगा रहे हैं ब्राम्हणों ने क्रोधित होकर कहा यशोदा तुम कहां हो तुम्हारे लाला ने सारा प्रसाद जूठा कर दिया यशोदा ने कहा था यह बालक है आप इसके अपराध को क्षमा कर दें मैं पुनः सब कुछ ला देती हूं आप दोबारा भोजन बना ले दुबारा जब ब्राम्हण देवता ने भोजन बनाया हूं भगवान को निवेदन किया तो कन्हैया फिर खीर खाने लगे ब्राम्हण देव क्रोधित हो गए उन्होंने कहा यशोदा तुम्हारा लाला बड़ा नटखट है यह बार बार भोजन देखा है अब मैं तुम्हारे यहां भोजन नहीं करूंगा लो संभालो अपने लाला को मैं तो चलता हूं यशोदा ने ब्राह्मणों ने विनय करके विप्र देवता को मनाया और कन्हैया को डांटते हुए कहा कान्हा चौहान क्या चाहता है अतिथि बिना भोजन किए लौट जाएं कन्हैया ने कहा मां इसमें मेरा कोई दोष नहीं है यह बार-बार भूख लग मुझे बुलाते हैं क्या मंदिर में प्रसाद पाने लगता हूं तो नाराज हो जाते हैं ब्राम्हण देव भक्त होते ही वह प्रभु को पहचान कर उनके चरणों में गिर पड़े और कहा प्रभु क्या है वो मुझे क्षमा करें मैं आपको पहचान न सका यशोदा आवा हो गया हूं देखती ही रह गई एक दिन सब की सब गोपियां इकट्ठा होकर नंदबाबा के घर आए और यशोदा मैया को सुना सुना कर जो माल की करतूतें कहने लगी अरे यशोदा तेरा कान्हा बड़ा नटखट हो गया है गाय दुहने का समय ना होने पर भी यह हमारे घर जाकर हमारे बच्चों को खोल देता है हमारे डांटने पर यह नटखट हटाकर हंसने लगता है यह चोरी के बड़े-बड़े उपाय करके हमारा दूध नहीं आया और उड़ा चुरा कर खा 

Krishna Kathayein - Tales of Shri Krishna Part-2

उसके एक ही प्रकार से शहर में भी छेद हो जाए वह पहले तो भयंकर रूप से बार-बार श्रीकृष्ण का प्रयास करने लगा और श्री कृष्ण मुस्कुराते रहे उन पर क्या कसूर के भय का कोई असर नहीं हुआ वह क्रोधित होकर बालकृष्ण को मारने के लिए छपता बालरूप भगवान श्रीकृष्ण ने बड़े हादसे कस कर कार्यालय को पकड़ लिया उसके प्राण छटपटाने लगे भगवान ने उसे घुमाकर इतनी जोर से कहो कि वह कल सके सभा मंडल में जा गिरा बड़ी मुश्किल से उसे होश में लाया गया कंस ने घबरा कर उससे पूछा तुम्हारी यह दशहरे की का कसूर ने कहा राजन जिसने मेरी गर्दन मरोड़ कर यह फेक दिया वह कोई साधारण बालक नहीं हो सकता निश्चित ही भगवान श्रीहरि ने कर लिया है एक दिन की बात है यशोदा मैया गोपी का के साथ कान्हा की बाल सुलभ लीलाओं की चर्चा कर रही थी जो खेलते-खेलते अचार दृष्टि चंद्रमा पर पड़ी उन्होंने पीछे से आकर यशोदा मैया का घूंघट उतार दिया अपने कोमल करों से उनकी चोटी पकड़ लिया खींचने लगे और बार-बार पीठ थपथपाने लग श्रीकृष्ण बोले मां मैं लूंगा मैया की समझ में बात हो गई तो श्रीकृष्ण को गोद में ले लिया और पूछा लाला तू ही क्या चाहिए हो साफ-साफ बताओ दूध दही मक्खन मिश्री जो चाहोगे वो मिलेगा अब मान भी जाओ रूठो मत श्रीकृष्ण ने कहा घर की वस्तु नहीं चाहिए उन्होंने अंगुली दिखाकर चंद्रमा की ओर संकेत किया और कहा वह चाहिए गोपियां बोली वह मेरे बाप यह कोई माखन का लौंडा थोड़े है हाय हाय यह हम कैसे देंगी यह तो प्यारा प्यारा हंस है जो आकाश सरोवर में तैर रहा है श्रीकृष्ण ने कहा मैं भी तो खेलने के लिए कुछ हंस को ही मांग रहा हूं कि घर का करो पार जाने के पहले ही उसे ला दो यशोदा जी ने कन्हैया को गोद में उठा लिया और कहा कान्हा जम्मू राजहंस है मैं चंद्रमा यह माखन का लौंडा है किंतु तुम्हें देने योग्य नहीं है देखो ना इस में काला काला भूख लगा हुआ है इसीलिए इसे कोई नहीं खाता श्रीकृष्ण ने कहा मैया मैया इसमें विश कैसे लग गया यशोदा जी ने कान्हा को गोरा हैकर कथा सुनाना प्रारंभ कर दिया यशोदा ने कहा लाला एक खीर सागर है श्री कृष्ण वह कैसा है मैया यशोदा बेटा कहां हो तुम जो दूध देख रहे हो ना इसी का एक समंदर है श्रीकृष्ण मैया कितनी गायों ने दूध दिया होगा तब समुद्र बना होगा यशोदा यह गाय का दूध नहीं है श्रीकृष्ण मैया तुम मुझे बहला रही है भला बिना गाय के भाव दूध नहीं होता है यशोदा जिस भगवान ने गायों को बनाया वह बिना गायों के भी दूध बना सकते हैं श्रीकृष्ण अच्छा ठीक है आगे कहां है यशोदा एक बार देवता और व्यक्तियों में युद्ध हुआ सत्य बलवान रहे हो बार-बार देवताओं को हरा भगवान ने देवताओं को अमर बनाने के लिए खीर सागर को माथा मंदराचल की मथानी बनी और वासुकि नाग की रस्सी बनाई गई एक तरफ देवता लगे और दूसरी सत्य श्री कृष्ण जय श्री गोपियां दही मथती है शोदा हरियाणा उसी से कालकूट नामक विश पैदा हुआ श्रीकृष्ण मां विष्णो सांपों में होता है दूध में कैसे निकला यशोदा बेटा वही विष भगवान शंकर ने पी लिया उससे जो धरती पर खुशियां पड़ी उसे पीकर सांप विषधर हो गए यशोदा ने कन्हैया को चलाने की ओर दिखाकर कहा यह मक्खन भी उसी से निकला है इसीलिए थोड़ा सा विश इसमें भी लग गया इसी को गलत कहा जाता है इसीलिए थोड़ा घर का


मक्खन खाओ इस मक्खन को पाने के भूल कर भी मत सोचना कथा सुनते सुनते कन्हैया को नींद आ गई और चांद खिलौना की बात चले आओ जहां की तहां रह गई गोकुल में चारों तरफ आनंद ही आनंद छाया रहता था वहां के निवासी श्री कृष्ण की बाल सुलभ लीला देखते नहीं लगाते थे और श्री कृष्ण नित्य नूतन लीला से सब को हिंदी में सराबोर करते थे नंदबाबा के भाग्य का तो कहना ही क्या था उनके सौभाग्य को देखकर बड़े-बड़े तपस्या मुनि भी सराहना करते थे भला साक्षात आनंदघन परमात्मा ही जिनके बालक बनकर चावला से जिन को रिझाने के लिए नित्य प्रति नवीन लीला की योजना बनाते हैं उनके सौभाग्य की बराबरी कौन कर सकता है एक दिन नंदबाबा क्यों होते की भांति प्रातः काल अपने इष्ट भगवान शालग्राम के पूजन अर्चना के लिए पूजा ग्रह में गए तनहाई भी नवीन लीला करने के उद्देश्य से छिपकर उनके पीछे पीछे लग गए नंद बाबा ने चाहा और जी को स्नान करवाया चंदन फूल माला चढ़ाया उनका सुंदर वस्त्र और आभूषणों से श्रृंगार किया भोग लगाया उसके बाद उन्होंने मधुर स्वर में ठाकुर जी की आरती की फिर आंखे मूंद ठाकुर जी से उन्होंने आओ प्रार्थना करते हुए कहा दीनानाथ कन्हैया के सलोने मुखड़े और मधुर चितवन ने मुझ पर जादू कर दिया है मैं जब कभी आपका ध्यान करता हूं मुझे लगता है कि कन्हैया ही कन्हैया चारों तरफ दिखाओ है उसे छोड़कर मुझे संसार की सारी वस्तुएं भूल गई है चलते फिरते उठते-बैठते सारा संसार कृष्णमय लगता है मुझे लगता है कि मैं पूजा पाठ रहा हूं बोलता जा रहा हूं प्रभु यदि मुझसे कुछ भूल हो गई हो तो मुझे क्षमा करना यह कहकर नंदबाबा ने ठाकुर जी को बार-बार दंडवत फिर ध्यानस्थ होकर बैठ गए गोपाल अभी खिंच आया हूं दूर से नंद बाबा की पूजा देख रहे थे जब उन्होंने देखा कि बाबा ने आंखें मूंद ली है उनके मन में एक नया खेल सूझा वह धीरे-धीरे पैर दबा अपनी बाबा के पास पहुंचे ताकि उनकी आहट सुनकर बाबा रहा न टूटे मैं थोड़ी देर तक चुपके से ठाकुर जी के पास बैठ कर रहा है वक्त की लगाए उन्हें देखते रहे फिर ठाकुर जी को सिहासन से उठाकर अपने मुख्य में रख लिया और धीरे से अपने स्थान पर आकर लेट गए इधर जैसे ही नंदबाबा का ध्यान टूटा है वह सामने सिंहासन से ठाकुर जी को गायब पाया उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा सोचा अभी अभी तो मैंने पूजन करके ठाकुरजी को सिंहासन पर आया हुआ घर आया था कि अचानक कहां चले गए नंदबाबा घबराकर चलाओ है नंदनी नंदनी तू कहां है जल्दी आओ आज तो महान आश्चर्य हो गया अभी-अभी में ठाकुर जी उनके सिंहासन पर पधार कर उनका ध्यान कर रहा था तो अचानक पता नहीं कहां गायब हो गए कहीं तुमने तो उन्हें उठाकर चाह नहीं रख दिया है अचानक उन्होंने देखा उनका प्यारा लाडला कन्हैया आओ ठाकुर जी को अपने मुंह में रखे हुए मंद मंद मुस्कुरा रे कन्हाई क्यों काटते हुए कहने लगे नटखट तुमने ठाकुर जी को मुख में रख लिया क्योंकि महिमा को क्या जानो यह साक्षात मेरे प्रभु है तो मैं इन्हें मुख में रखकर उनका अपमान किया है चलो उठो जल्दी से इन्हें मुझे दे दो और प्रणाम करके इनसे क्षमा मांगो कन्हैया ने बाबा की आज्ञा मानकर वैसा ही किया धन्य है वो दुखी प्रभु की वह तृतीय लीला एक दिन कान्हा को एक नई लीला सुझाव भगवान का काम


नित्य नई-नई लीलाएं करके को आनंदित करना था पूर्व जन्म में नंदबाबा और यशोदा मैया ने जान की उपासना करके भगवान से पुत्र रूप में वात्सल्य सुख की ही तो प्रार्थना की थी भगवान उस इच्छा को अधूरी कैसे रहने देते इसलिए वह नृत्य नवीन पांडे लीला से मां को रिझाने का प्रयास करते थे कान्हा नंद के चरणो मे आंगन में घुटनों के बल कि अधिकारी मारते हुए खेल रहे थे अचानक उनकी दृष्टि अपनी परछाई पर पड़ी तो उन्हीं का अनुकरण कर रही थी क्या जब भी हंसते तो परछाई हंसती थी जब चलते तो परछाई चलती थी कन्हैया बहुत खुश हुए सोचा चलो एक नया साथी मिल गया घर में अकेले खेलते खेलते मेरा मन खुश हो जाता है अब यह रोज मेरा मन बहलाया करेगा कन्हैया अपनी परछाई से बोले भैया तुम कहां रहते हो चलो हम दोनों मित्र बन जाएं कहां हो जब मैं माखन खाऊंगा तो तुम्हें भी खिलाऊंगा जब दूध पियूंगा तो तुम्हें भी पिलाऊंगा चलाओ भैया मुझसे बड़े हैं इसलिए वह मुझसे लड़ जाते हैं तुम मुझसे लड़ना नहीं हम लोग खूब प्रेम से रहे हो देखो ना यहां किसी भी चीज की कोई कमी नहीं है तुम्हें गाना माखन मिश्री चाहिए मैं तुम्हें मैया से कहकर दिला दूंगा आओ हम दोनों आपस में गले मिल ले ताकि आज से मित्रता अच्छा हो जाए इस प्रकार कहते हुए कन्हैया बार-बार अपनी छत जीने का प्रयास करने लगे बार-बार आगे पीछे इधर-उधर घूमते किंतु परछाई किसी की पकड़ में आई है क्या कि कन्हैया की पकड़ में आ जाती जब थक कर हार गए किसी प्रकार भी ना पकड़ सके तो दुखी हो गया यार श्याम के दुखी हो परछाई भी दुखी दिखाई देने लगी अपने लाल का मुखड़ा गाना देखकर यशोदा मैया नजदीक गई ध्यान से उन्होंने कन्हैया की तरफ देखा कन्हैया की आंखें डबडबा आई उन में आंसू भर गए हैं उनका आंचल पकड़कर सुबक सुबक कर रोने लगे मां ने पूछा कन्हैया तुम्हे क्या हो गया तुम क्यों रो रहे हो क्या है श्रीकृष्ण ने माता को अपना प्रतिबिंब दिखाकर बात बदल दी जय श्री कृष्ण बोले मैया मैया यह कौन है क्या वह लोग वह तुम्हारा माखन चुराने के लिए घर में घुस आया है मैं बार-बार मना कर मानता ही नहीं मैं क्रोध करता हूं तो यह भी क्रोध करता हूं मैया आओ ना हम दोनों मिलकर इसे बाहर कर दें नहीं तो यह तुम्हारा सब माखन खा जाएगा मैया कन्हैया के इस भोलेपन पर मुक्त हो गई क्या और कंहैया के आंसू पोंछ कर उन्हें गोद में ले लिया एक दिन माता यशोदा दही मत कर माखन निकाल रही थी अचानक मां को आनंद देने के लिए बल राम और श्याम उनके निकट पहुंच गए कन्हैया ने मटकी फोड़ी पकड़ ली और बलराम ने मोतियों की माला दोनों मां को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करने लगे बलराम कहते थे मां पहले तुम मेरी सुनो और कंहैया कहते थे नहीं मां पहले तुम मेरी सुन मैया मुझे बड़ी जोरों की भूख लगी है भूख से हारा बुरा हाल है चलो ना जल्दी से मुझे माखन रोटी दे दो देखो ना आए हैं खेलते खेलते बिल्कुल ही थक गया हूं मैं माखन रोटी खाकर जल्दी से सो जाना चाहता हूं यशोदा जी ने कहा बेटा दूध पी लो या घर में नाना प्रकार के पकवान बने हैं जो तुम्हारी इच्छा हो खा लो कन्हैया ने कहा नहीं मैं तो केवल माखन खाऊंगा मेवा पकवान तो मुझे बिल्कुल अच्छे नहीं लगते जब तक तुम मुझे माफ कर नहीं दे दोगी तब तक मैं तुम्हारी छोटी खींचता ही रहूंगा मां ने कहा 

Krishna Kathayein - Tales of Shri Krishna Part-1

करता ही नहीं था सभी धर्म के प्रेमी थे इसीलिए धर्म तथा अर्थ दोनों ही स्वतंत्र प्राप्त कर एक दिन महाबाहु राजा दुष्यंत आखेट के लिए अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ वन में गए उसे पार करने पर उन्हे महर्षि कण्व का आश्रम दिखाई पड़ा सबको आश्रम के द्वार पर ही रोक कर दुष्यंत अकेले ही आश्रम में गए आश्रम को सूना देख कर उन्होंने ऊंचे स्वर से पुकारा यह कौन है उनकी आवाज सुनकर लक्ष्मी जी के समान एक सुंदर कंया तपस्विनी के वेश में आश्रम से निकली थोड़ी देर वार्तालाप करने के बाद राजा दुष्यंत ने यह जान लिया कि यह शकुंतला नाम वाली राशि कन्या है राजा दुष्यंत उसके अनुपम रूप को देखकर उस पर मोहित हो गए राजा ने गंधर्व विधि से शकुंतला का पानी ग्रहण किया जिन्होंने शकुंतला को बार-बार यह विश्व शीघ्रातिशीघ्र उसे राजमहल में बुलवा लेंगे इस प्रकार कहकर पर अपनी राजधानी वापस आ गए समय पर आश्रम में ही शकुंतला कर गर्व से उत्तर उत्पन्न हुआ इस शिशु के जन्म लेते ही आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी देवगन तुम तुम भी आवाज आने लगे तथा अप्सराएं मधुर स्वर में गाती हुई नाचने लगी महर्षि कण्व ने विधिपूर्वक उसके जातकर्म आदि संस्का उनका सहारा भय जाता रहा माता देवकी ने कहा प्रभु पापी कंस को कहीं यह मालूम ना हो जाए कि आपका जन्म मेरे जन्म से हुआ है आपके लिए मैं कल से बहुत डर रही हूं आप अपने इस ग्रुप को छिपाकर बालक रूप में हो जाइए भगवान ने बेटी से कहा कि पूर्व जन्म में तुम्हारा नाम प्रश्न ही था और वसुदेव जी सतपाल नाम के प्रजापति थे तुम दोनों ने मुझे पुत्र रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की थी जब मैं प्रसन्न होकर तुम लोगों के सामने प्रकट हुआ तब तुम दोनों ने मुझे पुत्र रूप में पानी का वरदान मांगा मैं पहले जन्मे पृथ्वी गर्भ के नाम से तुम्हारा पुत्र हुआ दूसरे जन्म में तुम लोग कश्यप और अदिति हुए और मैं वामन रूप से तुम्हारा पुत्र हुआ जबकि इस बार फिर मैंने तुम्हारे गर्भ से अवतार लेकर अपनी वाणी की सत्यता को सिद्ध किया तुम लोगों को अपने पूर्व अवतारों का स्मरण दिलाने के लिए भी तुम्हारे सामने इस रुप में प्रकट हुआ हूं अब तुम लोग कंस के अत्याचार को समाप्त हिसार वात्सल्य सनेह से मेरे चिंतन से तुम दोनों को मेरे परम पद की प्राप्ति होगी अब तुम लोग शीघ्र ही मुझे गोकुल में लग रहे हो जाने की व्यवस्था करो तथा वहां से मेरी योग माया यशोदा के गर्भ से जन्म ले चुकी है उसे यहां ले आओ इतना कहकर भगवान चुप हो गए अब उन्होंने अपने माता-पिता के देखते झाले होते एक साधारण शिशु का रूप धारण कर लिया वसुदेव जी ने भगवान की आज्ञा से उन्हें गोकुल पहुंचाने की व्यवस्था की समय योग माया के प्रभाव से मथुरा के समस्त पुरवासी और द्वारपाल गहरी निद्रा में स्थित होकर सो गए बंदी ग्रह के सभी दरवाजे बंद थे उनमें लोहे की जंजीरें और मजबूत ताले लगे थे उसके बाहर जाना पड़ा ही कठिन था किंतु वसुदेव जी भगवान कृष्ण को गोद में लेकर यूं ही आगे बढ़े क्योंकि सब दरवाजे अपने आप खुलते चले गए ताले टूट कर गिर गए वसुदेव जी की हथकडी बेडी खुल गई जिस प्रभु के नाम स्मरण मात्र से संसार के सारे बंधन खुल जाते हैं वहां हथकडी बेडी और तारों की क्या कीमत है उस समय बादल धीरे धीरे गरजते हुए जल की फुहारें छोड़ रहे थे इसीलिए शीशा भगवान के सिर पर अपने होठों की


छाया करके वसुदेव जी के पीछे चलने लगे वर्षा का समय था यमुना जी बहुत बढ़ गई थी यमुना जी ने सोचा कि जिनके चरणों की धूलि के लिए बड़े-बड़े ऋषि मुनि रहती हैं वही मेरे तरफ आ रहे हैं यह सोच कर प्रसन्नता में उनकी आंखों से इतने आंसू निकले की बाढ़ आ गई उनका प्रवाह यह तेज हो गया जल में फैन ही फेल दिखाई दे रहा था सैकड़ों भयानक भंवरे पड़ रहा है जैसे ही वसुदेव जी श्री कृष्ण को लेकर यमुनाजी में उतरे उन्होंने चावल अपने जल को समेट लिया और श्रीकृष्ण को मार्ग देदिया कहीं-कहीं घुटनों चल रहे गया वसुदेव जी ने गोकुल में नंद बाबा के घर जाकर देखा कि सब के साथ होकर गहरी नींद में सो रहे हैं उन्होंने अपने पुत्र को यशोदा जी के बगल में सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को सुनकर मथुरा लाभ उठाएं बंदी ग्रह में पहुंचकर वसुदेव जी ने उस कंया को जन्मदिन की शैया पर सुला दिया और अपने हाथ पैर में हथकडी बेडी दांडेली बाहर भीतर सब दरवाजे जाओ अपने आप बंद हो गए इसके बाद कन्या के रोने की आवाज सुनकर द्वारपालों की नींद टूट गई चुल उड़ते हुए कंस के पास गए तथा देवकी को संतान होने की बात कही 10 बड़ी व्याकरण पर थे इस की प्रतीक्षा कर रहा था वह तुरंत पलंग से उठ खड़ा हुआ और कारागार की तरफ नंगी तलवार लिए हुए थे दिल से झांकता इस बार मेरे काल ने जन्म लिया है यह सोचकर कंस घबराया हुआ था उसके बाल बिखरे हुए थे तथा होंठ सूख रहे थे घबराहट में वह कई जगह गिरते गिरते बचा ने बंदी ग्रह में पहुंचते ही चिल्ला कर कहा देवकी कहां है वह बालक मैं अभी अपनी तलवार से काट कर जाओ उसके टुकड़े टुकड़े कर दूंगा ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी देवकी ने बड़े दुख और हम उनसे कहा मेरे प्यारे भाई यह तो कन्या है जो तुम्हारी भी पुत्री के समान है भला यह तुम्हें क्या मारेगी तुम्हे इसकी हत्या नहीं करनी चाहिए भैया तुमने एक-एक करके मेरे साथ पुत्रों को मार डाला मैंने तुमसे कुछ नहीं कहा मैं अपना अंचल पसारकर आज तुमसे इसके प्राणों की भीख मांगती हूं मैं तुम्हारी छोटी बहन हूं मुझ अभागिन पर दया करो यह मेरी अंतिम संतान है मैं दोनों हाथ जोड़कर तुमसे विनती करती हूं मेरे अरे भाई इसे तुम जीने का अधिकार दे दो यह मेरी अंतिम निशानी है जिसमें मैं तुमसे कुछ भी नहीं मांगूंगी कन्या को अपनी गोद में छिपाकर बड़ी दीनता के साथ देव की नहीं जाती है किंतु कंस बड़ा ही दुष्ट था उसके ऊपर देवकी की विनती का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा उसने देवकी को झटक दिया और कन्या को जबरदस्ती उसके आने से छीन लिया प्रकृति भी उसकी इस क्रूरता पर की कोठी सबके देखते देखते उस दुष्ट राक्षस ने अपनी भांजी का पैर पकड़कर जैसे ही चट्टान पर पटकना चाहा चाहे उसके हाथों से छूट कर आकाश में उड़ गई वह कन्या कोई साधारण तो थी नहीं साक्षात श्रीकृष्ण की योग माया थी आकाश में जाते ही वह देवी के रूप में बदल गई तथा अपने दिव्य स्वरूप में कंस को दिखाई पड़ी उसके 8 हाथ उन हाथों में त्रिशूल बाण ढाल तलवार शंख चक्र गदा सुशोभित थे वैधव्य माला चंदन तथा सुंदर आभूषण धारण किए थे देवता गंधर्व किन्नर और अप्सराएं उसकी स्थिति कर रहे हो उस देवी ने कंस से कहा रे मुर्ख मुझे मारने से तुम को क्या मिलेगा तुझे मारने वाला तेरा शत्रु कहीं और हो चुका है अब तू निर्दोष बालकों की हत्या मत कर मुझसे ऐसा कहकर


भगवती योग माया अंतर्ध्यान हो गई और विंध्याचल की बिंदिया ईश्वरी नाम से प्रसिद्ध जोगमाया की भविष्यवाणी सुनकर कंस को महान आश्चर्य हुआ उसने उसी समय वसुदेव देवकी को कारागार से छोड़ देने का आदेश दिया सनसनी वसुदेव देवकी से कहा मैं बहुत बड़ा पापी हूं मैंने भूलवश तुम्हारे बच्चों को मार डाला इस बात का मुझे कष्ट है मैं इतना दुष्ट हूं की तरह का मुझ में लेस भी नहीं है पता नहीं अब मुझे किस्मत में जाना पड़ेगा वास्तव में मैं तो जीवित होते हुए भी मुर्दे के समान हो लेकिन मेरा भी कोई दोष नहीं है सब जीव अपने प्रारब्ध के अनुसार ही सुख-दुख भोंकते हैं इसलिए तुम दोनों मेरे अपराध को क्षमा करो ऐसा कहकर कंस ने अपनी बहन और बहनोई के चरण पकड़ लिए वसुदेव और देवकी ने उसको क्षमा कर दिया योग माया के वचनों पर विश्वास कर वसुदेव देवकी को कारागार से छोड़ दिया गया क्या हम उनसे आदेश लेकर अपने महल चला गया कंस ने दूसरे दिन अपने दरबार में मंत्रियों को बुलाया और योग माया की सारी बातें हमें बताएं कंस के मंत्री व्यक्ति होने के कारण स्वभाव से ही क्रूर थे वह सब देवताओं के प्रति शत्रुता का भाव रखते थे अपने स्वामी कंस की बात सुनकर उत्सवों ने कहा यदि आपके शत्रु विष्णु ने कहीं और जन्म ले लिया है तो हम 10 दिन के भीतर जग में सभी बच्चों को आज ही मार डालेंगे हम आज ही बड़े-बड़े नगरों छोटे गांव अहीरों की बस्तियों और अन्य स्थानों में जितने भी बच्चे पैदा हुए हैं उन्हें समझ कर मारना शुरू कर देते हैं आपका शत्रु कहां जाएगा एक ना एक दिन हमारे हाथों मारा ही जाएगा आपके प्रताप से हमें एकांतवासी विष्णु वनवासी शंकर कायर इंद्र से कोई भी भय नहीं है फिर भी शत्रु को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए इसलिए इसे जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए आप हम जैसे सेवकों को आदेश दीजिए यदि पहले शत्रु की उपेक्षा कर दी जाए तो वह फॉर्म जमा बाद में उसे हराना कठिन हो जाता है अतः उसे शक्तिशाली होने से पहले ही समाप्त कर देना चाहिए देवताओं की जड़ है विष्णु और वह वहां रहता है जहां सनातन धर्म है सनातन धर्म की जड़ है वीर गांव जमुना तपस्या और यज्ञ अमिन का विनाश कर देंगे तो विष्णु अपने आप मर जाएगा एक तो कंस की बुद्धि वैसे भी बिगड़ी हुई थी दूसरे उसके मंत्री उससे भी अधिक दुष्ट थे उनकी सलाह में आकर कंस ने आदेश दिया ब्राम्हण गांव संत तथा अनुदिन या उससे अधिक दिन के बच्चे जहां भी मिले उन्हें तुरंत मार दिया जाए कि आदेश से दुष्ट नृत्य नवजात बच्चों को जहां बातें वही मार देते यज्ञ दान तप सदाचार कहीं दिखाई नहीं देते चंद्रपुर में भी उत्पाद शुरू हो गए अभी छठी के दिन भगवान का जार कर्म संस्कार ही हुआ था कि कैंसर के द्वारा भेजी गई पूतना श्री कृष्ण को मारने के लिए संत बाबा के घर पहुंची उसने सुंदर गोभी का वेश बनाकर श्रीकृष्ण को गोद में उठा लिया और अपने विश लगे स्तनों का दूध पिलाने लगी श्रीकृष्ण ने दूध के साथ उसके प्राणों को भी खींच लिया और उसे हम लोग भेज दिया एक दिन की बात है नन्हे से कन्हाई कॉलोनी में लेटे हुए अकेले ही कुछ वहां कर रहे थे और अपना हाथ पैरों को हिला रहे थे उसी समय कंस का भेजा हुआ एक दुष्ट राक्षस आओगे का वेश बनाकर उड़ता हुआ वहां आ पहुंचा विकराल था तथा अपने पंखों को फड़फड़ा रहा था उसकी सोच कितनी नुकीली और शक्ति 

Sunday, 2 July 2017

Top Hindi Kavita for Indian Bloggers and Hindi Readers

यक्ष भाषा

पर यक्ष जिस भाषा में पूछेगा प्रश्न
वह तो सीखनी रह ही गई
मां के दूध के साथ
तुतलाहट भरी
सीख ली थी वह पहाड़ी बोली
विद्वान जिसे कहते रहे अपभ्रंश
नारियल की फटी टाट पर
कौवे की क...का...पंचम स्वर में चलती रहती
जब तक घिस नहीं जाता था पाजामा

कविता बंजारन सी

बंजारन सी कविता।
पंख लगार सपनों के वो,
भ्रमण करे सारी सृष्टि,
जीवन के सूने पतझर में,
करे सदा अमृत वृष्टि,
होठों पे मुस्कान अमर सी, आंखों में बहती सरिता,
बंजारन सी कविता।
छान्द बने पायलिया इसकी,
लय चुनर सी लहराती,

तेरी आंखों में संसार

तेरी आंखों में संसार।
प्रेम पर निबंध लिखती,
भीनी-भीनी सी पवन,
आसमां देता निमंत्रण,
उडऩे को आतुर है मन,
पूछता है प्राण मुझसे,
कितना पांखों का विस्तार।
तेरी आंखों में संसार।
महक उठा मन का उपवन,
मधुर मिलन मदहोश घड़ी, 

इस कोने में

काल का कबाड़-घर
काल के कबाड़घर में
पता नहीं कितना
कबाड़ भरा है।
इधर, इस कोने में
श्री-श्री 108, 1008
महामंडलेश्वर,
महाराजाधिराज, भूपति,
अखिलेश्वर,
योद्धा देहधारी,
आतंकी, आततायी,
भक्तगण, पंडे-पुजारी,
नेता-अभिनेता,
शब्द-शिल्पी साहित्यकार,
साधक, आराधक,
निपुण कलाकार,
चारण-भाट, दरबारी,
सामन्त और श्रीमन्त,
दस, बीस, तीस हजारी,
जाने कितने भरे हैं। 

आखिरी दिनों में

टूटकर कभी जुड़ता
नहीं
आपसी विश्वासों पर
खड़ा है
दुनिया के किसी भी
बचत बैंक से
बड़ा है
गुल्लक बिटिया का
अक्सर टूट जाता है
अब
माह के
आखिरी दिनों में
मां कहती है
नया
खरीदकर लायेंगे
पहले से
ज्यादा पैसे बचायेंगे 

प्रगति

इन तमाम वर्षों में याने
पिछले साठ वर्षों में
देश की प्रगति
सिर्फ पत्थरों में हुई
शिलालेख लिख गए
स्मारक बन गए
जगह-जगह शिलान्यास हो गया  

हरितक्रांति

हरित क्रांति का निरीक्षण
करते-करते
कभी ऊपर देखते, कभी नीचे देखते
आजू-बाजू की हरियाली निहारते
देश के कृषि मंत्री महोदय
मंूगफल्ली के खेत में पहुंचे
और लहलहाती फसल देखकर
किसान से पूछे
फल कहां है?
मुझे तो लगता है

तुम याद बहुत आये- Best Hindi Geet

सुबह, दुपहरी, सांझ तुम याद बहुत आये,
जब भी मौसम मुस्काया, तुम याद बहूत आये।
फूल खिले सपनों के मुस्कानों वाले गीत,
हीकों में छाल-छाल छलके ये तेरी मेरी प्रीत।
प्रीत की बात चली जब तुम याद बहूत आये।
जब भी मौसम... 

हिन्दी के समालोचकों द्वारा भुला दिए गए

पहले समालोचक : माधवराव सप्रे
सुशील कुमार त्रिवेदी
दोष किसका है, कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन स्थिति यही है कि एक मराठी भाषी जीवन भर निष्ठïा तथा एकाग्रता से हिन्दी की सेवा करता रहा, और हिंदी के इतिहासकारों ने उसे भुला दिया। जिस व्यक्ति ने हिंदी में समालोचना-लेखन की परंपरा की नींव डाली, सशक्त निबंधों की रचना की और कई महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, उसी व्यक्ति पं. माधवराव सप्रे का नाम पंडित रामचंद्र शुक्ल और उनके ग्रंथ को आधार बना कर ‘नकल नवीस इतिहासकार’ बनने वालों को याद नहीं रहा, यह एक भूल है या साहित्य-इतिहासकारों की साधन-दरिद्रता है?
पिछड़े इलाके का अगुआ
मध्यप्रदेश, जो आज भी पिछड़ा माना जाता है, उसी का एक और पिछड़ा इलाका छत्तीसगढ़ सप्रेजी की कर्मभूमि रहा, इसी क्षेत्र में उन्होंने आज से लगभग 75 वर्ष पूर्व हिन्दी आंदोलन शुरू किया था। उन्हें छत्तीसगढ़ की सोंधी मिट्टïी से इतना ममत्व था, इतना अनुराग था कि उन्होंने अपने साहित्यिक मासिक पत्र का नाम ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ रखा। यह वही छत्तीसगढ़ मित्र है जिसमें सबसे पहली बार हिंदी ग्रंथों की समालोचना प्रकाशित हुई। बनती संवरती रूप लेती हिन्दी में प्रकाशित होने वाले पहले ग्रंथों की पहली समालोचना को लिखने वाले सप्रे जी ही थे।
पेंड्रा (जिला-बिलासपुर) के राजकुमारों को पढ़ाने से मिलने वाले वेतन में से पैसा बचाकर सप्रे जी ने जनवरी 1900 में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन आरंभ किया। पं. श्रीधर पाठक, जिन्हें आचार्य शुक्ल ने ‘सच्चे स्वच्छंदतावाद का प्रवत्र्तक’ माना है, की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों,- ऊजड़ ग्राम, एकांतवासी योगी, जगत सचाई सार, धन-विजय, गुïणवंत हेमंत तथा अन्य, की विस्तृत विश्लेषणात्मक और विवेचनात्मक वैज्ञानिक समालोचना इसी पत्र में पहली बार प्रकाशित हुई। इसी प्रकार मिश्रबंधु तथा पं. कामता प्रसाद गुरु आदि तत्कालीन महत्वपूर्ण साहित्यकारों की कृतियों की समालोचना सप्रे जी ने ही लिखी। इसके अतिरिक्त पं. महावीर प्रसाद मिश्र, पं. कामता प्रसाद गुरु, पं. गंगा प्रसाद अग्निहोत्री, पं. श्रीधर पाठक आदि की रचनाएं प्राय: ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित होती रही।
कुछ वर्ष पूर्व एक ख्याति प्राप्त कहानी-मासिक (सारिका) पत्रिका में एक परिचर्चा प्रकाशित हुई, जिसमें माधवराव सप्रे द्वारा लिखित ‘एक टोकरी भर मिट्टïी’ को हिंदी की पहली मौलिक कहानी बताया गया था। यह कहानी ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में सन् 1901 में प्रकाशित हुई थी।
अर्थाभाव के कारण ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन दिसंबर, 1902 में बंद हो गया, पहले एक साल तक इसका मुद्रण रायपुर कैयूमी प्रेस में हुआ, किंतु बाद में यह नागपुर के देशसेवक प्रेस में मुद्रित होता था। 

Kauwa Aur Sone Ka Haar - कोआ और सोने का हार

जब एक बार कोयल बच्चों को जन्म दे रही होती है इसलिए वह कोए को बाहर भेज देती है. फिर थोड़ी देर बाद में कोए को अंदर बुलाती है. अंदर आते ही वह ...